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अमेरिकी दंगे के पीछे Facebook के जकरबर्ग का भी हाथ?

6 जनवरी को हथियार सहित भीड़ ने अचानक अमेरिकी संसद पर हिंसक कार्यवाही करते हुए हमला कर दिया गया। हैरानी की बात है हिंसक भीड़ को भी पुलिस रोक नहीं पाई थी। लेकिन अब इस ममाले में Facebook का नाम सामने आ रहा है जो और ज्यादा हैरान करने वाला है|

कुछ दिन पहले ब्लैक प्रोटेस्टर्स पर गैरज़रुरी हिंसा करने वाली पुलिस ने दंगाईओं के साथ नरमी क्यों दिखाई। इस वजह से पुलिस भी दुनिया की नज़र में शक की निगाहों में है।

दुनिया भर में अमेरिकी संसद में हुऐ दंगाई भीड़ के आतंक के चलते पुलिस भी अब शक के घेरे में है। वहीं दूसरी तरफ फेसबुक के मार्क जकरबर्ग ने ट्रंप को बैन कर दिया है।

जकरबर्ग ने अमेरिकी संसद में हुई इस हिंसा को रोकने और फैलने के लिए यह साहसी फैसला लिया हैं पर क्या वाकई यह फैसला साहसी है? क्या वाकई जकरबर्ग ने नैतिकता दिखाते हुए ट्रंप को बैन किया है।

इससे पहले Facebook के साथ क्या रिश्ता रहा है ट्रंप का ?

अमेंरिकी संसद मे जो कुछ हुआ उसने अमेरिकी लोकतंत्र की इज़्जत दुनिया भर में घटा दी, साथ ही अमेरिका मे पुलिसीआ कार्यवाही पर भी बड़े सवाल खड़े किए है। साथ ही Facebook ने भी ट्रंप को बैन कर दिया हैं।

इस मामले को समझने के लिए शुरुआत से शुरु करते हैं, साल 2016 में जब 8 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव संपन्न हुआ और अगले ही दिन यानी 9 नवंबर को यह घोषणा हो गई की ट्रंप अगले राष्ट्रपति पद पर बैठेंगे, पर हैरानी की बात तो यह थी कि जिस व्यक्ति को चुनावी रुझानों और विशेषज्ञों द्वारा यह कहा गया था कि वह अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव नहीं जीत सकता तो वह व्यक्ति आखिर जीता तो कैसे जीता?  तो बता दें की उस वक्त चुनाव में ट्रंप की बड़ी जीत के लिए सबसे बड़ा जो प्लेटफॉर्म बना था वह था फेसबुक

2016 में भी राष्ट्रपति चुनावों में Facebook ने निभाई थी अहम भूमिका

दरअसल  Facebook के ज़रिए ट्रंप को चुनाव जीताने के लिए एक तरह का कैंपन चलाया गया था जिसके नतीजन ही ट्रंप ने चुनावों में जीत हासिल कर ली थी। एक व्यक्ति जिसका नाम हैं ब्रैड पार्सस्केल जिसने अमेरिका राष्ट्रपति चुनावों से पहले डोनाल्ड ट्रंप को लेकर फेसबुक पर खूब प्रचार किया था, यह ट्रंप के संपर्क में कैसे आया यह भी जान लीजिए, ब्रैड पार्सस्केल एक छोटा मोटा डिजिटल मार्केटर था जिसके पास ट्रंप एक वेबसाइट को बनवाने के लिए गए थे , ट्रंप चुनाव में एक अच्छा डिजिटेल मार्केटर ढूंढ ही रहे थे कि उनकी डील ब्रैड के साथ हो गई।

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क्या जकरबर्ग करना चाह रहें है पश्चाताप?

अब यह समझिए कि कैसे फेसबुक का इस्तेमाल चुनाव में अहम साबित हुआ , हमें अमूमन यहीं लगता हैं कि फेसबुक का अधिकतर इस्तेमाल केवल फोटो पोस्ट और वीडियों शेयर करने के लिए ही होता हैं लेकिन नहीं फेसबुक एक डिज़िटल मार्केट प्लेटफॉर्म की तरह भी काम करता हैं।

हम जब फेसबुक पर अपनी आईडी बनाते हैं तब ही फेसबुक पर हमारी सभी डिटेल इक्ठ्ठा हो जाती हैं, और फिर फेसबुक हमारी पसंद और रुचि और उम्र के अनुसार हमें चीजें परोसती हैं औऱ हमें लगता हैं कि हम अपनी पसंद के अनुसार वह चीज़े ढूंढ रहें है, इसी तरह 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले ही फेसबुक पर कई तरह के फर्जी मेसैज को शेयर किया जा रहा था|

जैसे हिलैरी क्लिंक्टन का फ्रांसी राष्ट्रपति के साथ गलत संबंध होना, उनका यहूदियों के साथ संबध होना इसी प्रकार के झूठे मैसेज को फैलाया गया था।

इस वजह से मार्क जकरबर्ग की भूमिका पर भी कई सवाल खड़े हुए थे, जिसपर सफाई देते हुए जकरबर्ग ने 10 नवंबर 2016 को यानी चुनाव से ठीक दो दिन बाद अपनी सफाई में यह कहा था कि फेसबुक पर लगाए जाने वाले सभी आरोप गलत हैं मैं किसी के सच झूठ का निर्णय लेकर उस पर कुछ नहीं कर सकता सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है

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क्या आने वाली सरकार से डर गया Facebook ?

लेकिन मार्क जकरबर्ग के इस बयान से उन्ही के कुछ अधिकारी बहुत खफा हुए और सबके सामने मार्क की इस फेसबुक मैसेज़ की पॉलिसी को गलत ठहराया , अब बात करते हैं हालिया साल 2020 की, अमेरिका में एक तरफ ब्लैक प्रोटैस्टर का हंगामा , कोरोना संक्रमण औऱ राष्ट्रपति चुनाव को लेकर फेसबुक पर मानों पोस्ट की बाढ़ सी आ गई हो

कभी ट्रंप कोरोना को झूठ बताते तो कभी डिसइंफेक्टिव इंजेक्शन लगवाने के लिए कहते इसके लिए ट्वीटर ने तो ट्रंप पर लगाम भी लगाई पर फेसबुक यहां भी चुप ही रहा।

और यह फेसबुक पर फैलाई गई झूठी खबरों और झूठे दावों के कारण ही 6 जनवरी को चुनाव के नतीजा ही था जिसके चलते अंध भक्तों ने अमेरिकी संसद पर धावा बोल दिया जिसके बाद फौरन जकरबर्ग ने ट्रंप के फेसबुक अकाउंट को 20 जनवरी तक के लिए बैन कर दिया क्योंकि शायद अब जकरबर्ग नहीं चाहते कि सत्ता के हस्तांतरण तक किसी भी प्रकार की हिंसा हो।

यहां यह साफ था मार्क यहां अब अपनी आलोचना से बचने के लिए फौरन कार्यवाही कर रहें है। जकरबर्ग को अब यह पता हैं कि ट्रंप का कार्यकाल अब खत्म हो गया हैं और अब अगर वो कार्यवाही नहीं करते तो आने वाली सरकार में उनके लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

रिपोर्ट –रुचि पाण्डें

मीडिया दरबार

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