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और जीवन बीत गया……कुंवर नारायण

पुण्यतिथि :- कुंवर नारायण

कुंवर नारायण हिन्दी के सर्वाधिक प्रसिद्ध व प्रशंसित कवि रहे हैं| उनका रचना संसार किसी भी सीमा के बंधन से मुक्त है| उनकी रचनाओं में जीवन की दार्शनिकता तथा वास्तविकता दिखती है| जीवन के प्रति प्रेम दिखता है, अनुराग दिखता है| कुंवर नारायण को पढ़ने वाले उनसे प्रेम करने लगते हैं|

कविताओं को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कुंवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को उत्तरप्रदेश के फैज़ाबाद जिले में हुआ था| उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए की डिग्री ली थी| लेकिन उनका मन रमा हिन्दी साहित्य में, जिसको उन्होंने बहुत कुछ दिया|

कविताओं के साथ-साथ कहानियां, लेख, समीक्षाएं फिल्मों और रंगमंच की दुनिया पर भी उन्होंने काफी कुछ लिखा है| कुंवर नारायण की पहली कविता संग्रह ‘चक्रव्यूह’ के नाम से प्रकाशित हुई थी| जिसने उन्हें साहित्य की दुनिया में एक असमिति संभावना वाले कवि के रूप में स्थापित कर दिया था| कुंवर नारायण की अन्य प्रसिद्ध काव्य संग्रहों में तीसरा सप्तक, परिवेश: हम तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, कविता के बहाने आदि प्रमुख हैं|

आकारों के आसपास नाम से उनकी एक कहानी संग्रह भी आई है| आज और आज से पहले, मेरे साक्षात्कार, साहित्य के कुछ अंतर्विषयक सन्दर्भ नाम से उनकी कुछ समीक्षाओं के संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें उन्होंने देश, समाज, साहित्य के बारे में अपने राय व्यक्त किए हैं|

हिन्दी साहित्य में असाधारण योगदान के लिए कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा भारत सरकार द्वारा तीसरा  सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण दिया जा चुका है| कुंवर नारायण की मृत्यु 15 नवंबर 2017 को 90 की अवस्था में दिल्ली में हो गई| 

प्रस्तुत हैं कुंवर नारायण रचित कुछ महत्वपूर्ण कविताएं :-

1 उदासी के रंग

उदासी भी

एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं

जैसे

फ़क्कड़ जोगिया

पतझरी भूरा

फीका मटमैला

आसमानी नीला

वीरान हरा

बर्फ़ीला सफ़ेद

बुझता लाल

बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता

उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त

कि कहीं वे

किन्हीं उदासियों से ही

छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?

2 प्यार की भाषाएं

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है
पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में…
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:
दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक 
फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी उंगुलियां
एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धूप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था
धीरे धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी
और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है:
एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल…
अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा

3 मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता
कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है
हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है
ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए
इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छूकर
जीवन की असंख्य तरंगें…

और जीवन बीत गया

इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया..

 

 

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