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केरल की स्वास्थ्य व्यवस्था से सीखने की जरूरत है अन्य राज्यों को

केरल ने कैसे कोरोना की दूसरी लहर को दी मात ?

देश की राजधानी दिल्ली समेत देश के कई अन्य बड़े राज्य लगातार ऑक्सीजन की कमी का सामना कर रहे हैं |
केंद्र और राज्य सरकारें लगातार इस कमी को पूरा करने की हर संभव कोशिश भी कर रही है | लेकिन स्थितियां अब इस हद तक बेकाबू है कि उन्हे ठीक करने के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे हैं |

लेकिन यहां हम शुरू से सिर्फ उन्ही राज्यों की चर्चा करने में लगे हैं जहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था पर पहले से ध्यान नहीं दिया गया |अब वह राज्य आज उसी का खामियाजा भुगत रहे हैं | लेकिन क्या देश के सभी राज्यों की हालत दिल्ली, महाराष्ट्र,उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश जैसी है?|
जवाब में आता है नहीं | इन राज्यों में ऑक्सीजन की कमी के कारण दम तोड़ते मरीजों के बीच एक राज्य ऐसा भी है, जो इस स्थिति में भी ऑक्सीजन का न सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए पर्याप्त उत्पादन करने में सक्षम है, ब्लकि अपने पड़ोसी राज्यों की मदद के लिए भी ऑक्सीजन सप्लाई कर रहा है |

ऑक्सीजन की कमी को कैसे मात दे रहा है केरल?

केरल
Source Social Media

हम बात कर रहे हैं देश के सबसे शिक्षित राज्य की, यानी केरल की| अपने राज्य में आक्सीजन की पर्याप्त सप्लाई के साथ ही,
केरल अभी ही नियमित रूप से प्रतिदिन 70 मीट्रिक टन ऑक्सीजन तमिलनाडु को और 16 मीट्रिक टन ऑक्सीजन कर्नाटक को निर्यात कर रहा है|

मौजूदा हालात को अगर देखें, तो केरल को देख कर लगता है कि यहाँ आक्सीजन की कोई कमी नहीं है, और आने वाले समय में जैसा की अनदेशा है, कोरोना के मामलों के और तेज गति से बढ़ने की तो उस स्थिति में भी, इस राज्य के पास इतनी क्षमता है, कि यह अपनी जरूरत के हिसाब से आक्सीजन का उत्पादन कर सकेगा |

अभी की स्थिति के हिसाब से केरल को हर रोज़ 35 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की और नॉन-कोविड केयर के लिए प्रतिदिन 45 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है | साथ ही फिलहाल इस राज्य में प्रतिदिन 199 मीट्रिक टन तक ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता है | साथ ही इस राज्य की तैयारी ऐसी है, की और अधिक आक्सीजन की जरूरत पड़ने पर इस क्षमता को और अधिक बढाया भी जा सकता है|
लेकिन यहाँ एक बात जो बेहद हैरान करने वाली है, वो यह है कि केरल जो आज दूसरे राज्यों को ऑ्सीजन उपलब्ध करा रहा है, वो पिछले साल तक खुद ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा था|

लेकिन कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान ही केरल ने उचित क़दम उठाए| जब देश में कोरोना महामारी बढ़ने लगी थी, तभी इस राज्य ने अपने सभी प्लांट्स को मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादन को बढाने के निर्देश जारी कर दिये थे | यह इस राज्य की तब की ही तैयारी है, जो अब उनके काम आ रही है| यानि जब देश के बाकी राज्य कोऱोना को अनदेखा कर चुके थे, तब केरल खुद को कोरोना की दुसरी लहर से लड़ने के लिए तैयार कर रहा था|

केरल ने किया सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का विस्तार

लेकिन क्या केरल में आक्सीजन की कमी न होने का सिर्फ यही एक कारण है | राज्य के पास आक्सीजन की सप्लाई पर्याप्त है ऐसा नहीं है | इसका एक अहम कारण है, केरल की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का सुदर्ठ होना | अपने इसी स्वास्थ्य प्रणाली के दम पर, यह राज्य शुरुआती स्टेज में ही कोरोना मामलों की पहचान कर पाने में सक्षम हैं| ऐसे में यहाँ कोरोना मरीजों का इलाज भी जल्दी शुरू हो जाता हैं, इसलिए हर मरीज़ को ऑक्सीजन लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती |

केरल ने अपने राज्य में वॉर्ड कमेटी को पुनर्जीवित किया है| वॉर्ड कमेटी के सदस्य जैसे ही किसी को बुखार होता है या किसी में कोई भी कोरोना के लक्षण दिखाई देते है, फिर चाहे बुखार ही क्यों न हो उन सभी का कोविड टेस्ट ज़रूर किया जाता है| फिर उस के बाद उनका इलाज शुरू कर दिया जाता है | बाकी राज्यों की तरह यहाँ आक्सीजन लेवल कम होने का इंतजार नहीं किया जाता|

यहा आपको ये भी बता दे की कोरोना जब देश के लिए नया था | सरकारे इससे अनजान थी, तब भी केरल ने जिस तरह से कोरोना संक्रमण पर रोकथाम की थी, उसे लेकर देश में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी केरल की सरकार और खासकर केरल की स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा की काफी सराहना की गई थी|

देश के जिन पांच राज्यों में विधायनसभा के चुनाव थे, उनमें केरल भी शामिल था | त्योहारों और चुनावी प्रचार के कारण इस राज्य में भी कोरोना के मामलों में बढोतरी देखी गई थी | लेकिन केरल की स्वास्थ्य व्यवस्था ने स्थिति को अब तक थामे रखने में सफलता हासिल की है|
यहा देश के बाकी राज्यों को केरल से सीखने की जरूरत है |  एक तरफ ऐसे राज्य हैं, जिनके पास आक्सीजन को स्टोर करने के लिये कंटेनर्स तक नहीं है, तो दूसरी तरफ केरल है, जिसने न सिर्फ समय रहते अपनी तैयारी की ब्लकि आज खुद को इस हद तक आत्मानिर्भर बनाया की पिछले साल आक्सीजन की कमी से जुझने वाला ये राज्य आज दूसरे राज्यों को आक्सीजन की मदद दे रहा है|
कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपनी तैयारी के लिये केरल वाकई प्रशंसा का पात्र है |

रिपोर्ट – पूजा पाण्डेय

मीडिया दरबार

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प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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