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कोरोना के कहर के बीच भी कब तक जारी रहेगी राजनीति|

कोरोना से मरते लोगों के बीच क्या धर्म है जरुरी

आज कि रिपोर्ट शुरू करने से पहले आपको देश भर में कोरोना के बढ़ते मामलों का एक बार आंकड़ा बता देते हैं तो देश में इस वक्त कोरोना के कुल 16,79,740 एक्टिव केसेज़ हैं|

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देश के कई राज्यों से लगातार डराने वाली तस्वीरे सामने आ रही हैं जहा शमशानों में लाशों कि भीड़ दिखाई दे रही हैं, देश भर में ओक्सिजन सलेडरस कि कमी के कारण लगातार कोरोना संक्रिमितों कि सांसे थमने कि खबर समाने आ रही हैं| अस्पतालों के बाहर मरीजों कि लम्बी कतार हैं जो बेड कि कमी के कारण कोरोना के मरीज़ दम तोड़ने को मजबूर हैं|

कोरोना के बढते मामलों के बीच हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था कि नाकामी इन तस्वीरों से साफ़ जाहिर होती हैं, ज्यादातर राज्य सरकारे और प्रशासन चुप चाप बैठे अपनी नाकामियों को देख रहे हैं क्युकी अब उनसे कुछ करते बन भी नहीं रहा|

लेकिन यहाँ हद तो देखिये राजनीती कि लोग मर रहे हैं लाशें जलाने को शमशानों में जगह नहीं हैं लेकिन ऐसे में भी चुनावी रैलीया जारी हैं|

लेकिन क्या आज हमारी स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ राजनीती और नेताओं को दोष देना सही हैं क्या हम इसके लिए दोषी नहीं हैं|

सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा हैं ट्रेंड

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सोशल मीडिया पर एक तरफ जहा लोग लगतार मदद कि गुहार लगा रहे हैं उनके अपनों को हॉस्पिटल में बेड्स और इलाज़ कि कमी से जूझ रहे हैं तो वही दूसरी ओर सोशल मीडिया पर एक अलग ही मुहीम चलाई जा रही हैं|

नहीं, कोरोना से देश को बचाने कि मुहीम नही मंदिरों को बचाने कि मुहीम जी, आपने सही सुना ऐसे समय में जब लोगो कि आखिरी उम्मीद भी उनसे छिनती जा रही हैं, ऐसे वक्त में लोग यहाँ भगवान और मंदिरों को बचाने कि लड़ाई लड़ रहे हैं| ट्विटर पर सुबह से एक हैशटैग ट्रेंड हो रहा हैं #Remove1991WorshipAct |

क्या हैं उपासना स्थल अधिनियम 1991

अब सबसे पहला सवाल कि ये एक्ट हैं क्या और इसे हटाये जाने कि मांग क्यों और कौन लोग कर रहे हैं
तो आइये एक एक कर आपको इन सभी सवालों के जवाब देते हैं

तो सबसे पहले कि 1991 वोर्शिप एक्ट क्या हैं तो जैसा कि इसके नाम से जाहिर हैं कि ये एक्ट 1991 में अस्तिव में आया|

उपासना स्थल अधिनियम, 1991 एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अधिनियम है। इसमें वर्तमान में केवल 7 धाराएं हैं, मूल रूप से 8 धाराएं थी, लेकिन धारा 8 को 2001 में एक संशोधन द्वारा रद्द कर दिया गया था।

इस एक्ट के अनुसार 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगा दिया गया

साधारण भाषा में कहे तो इस एक्ट में ये कहा गया कि 15 अगस्त 1947 के बाद देश के धार्मिक स्थलों में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता यानी इस दिन के बाद जो मंदिर हैं वो मंदिर और जो मस्जिद हैं वो मस्जिद ही रहेंगे|

लेकिन इस कानून के कुछ अपवाद हैं यह अधिनियम उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद और उक्त स्थान या पूजा स्थल से संबंधित किसी भी वाद, अपील या अन्य कार्यवाही के लिए लागू नहीं होता है|

क्या धर्म को बचाना जरुरी हैं इंसान को बचाने से

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और इसी के आधार पर कोर्ट ने रामजन्म भूमि का फैसला सुनाया था, खैर बात यहाँ इस कानून कि या इसके अपवाद कि हैं ही नहीं बात ये हैं कि जिस स्थिति में अभी हम हैं क्या उस स्थिति में भी इस तरह के प्रचार और मांग आपको बेतुके नहीं लगते जिस समय में आपको सरकार से कोरोना कि दवाइयों सुविधाओं कि मांग करनी चाहिए ऐसे समय में आप ऐसे कानून में परिवर्तन कि मांग कर रहे हैं|

 

क्या हमारे लिए हिन्दू मुसलमान होना इंसान होने से ज्यादा जरुरी हैं क्या आपके पास सत्ता का होना लोगो के सुरक्षित होने से ज्यादा जरुरी हैं|

राजनेताओं और उनकी राजनीती पर हसने और उनकी नीतियों को बुरा भला कहने का हमें क्या हक़ हैं अगर हम खुद इस तरह कि मांग करते हैं|

अगर आप चुनावों में वोट मंदिर बनवाने के नाम पर देंगे तो जरुरत के वक्त हॉस्पिटल में कोरोना बेड्स कि मांग आप कैसे कर सकते हैं|

अगर आप ऐसे नाज़ुक वक्त में भी अपने धर्म को बचाना जरुरी समझते है तो कोई हक़ नहीं हैं आपको नेताओं को कोसने का क्युकी नेताओं का तो धर्म ही हैं राजनीती तो अगर आप अपने धर्म को ऐसे वक्त में भी न भूले तो आप नेताओं से भी ऐसी कोई उम्मीद नहीं कर सकते|

आज अगर देश कि स्वास्थ्य व्यवस्था आपके अपनों कि मौत का कारण बन रही हैं तो इसके जिम्मेदार कही न कही आप खुद भी तो हैं| क्योंकि आपने ही तो आज इस स्थिति को चुना था आपने ही तो स्वाथ्य,शिक्षा,विकास के ऊपर अपने धर्म कि स्थापना को चुना था|

ये कोरोना महामारी हमें बहुत कुछ सिखा चुकी हैं एक सीख शायदा और दे रही हैं वो ये कि आप जैसा समाज देखना चाहते हैं आपको अपनी मांग कि वैसी ही करनी होगी|

ऐसी स्थिति में राजेनेता अगर चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो आप भी तो उसका हिस्सा बन रहे हैं क्या आप एक उसका वहिसकार कर अपनी नाराज़गी जाहिर नहीं कर सकते|

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विचार कीजियेगा इन सभी सवालों पर और मुझे दीजिये इज्जाजत कल फिर मुलाकात होगी अगली स्पेशल रिपोर्ट के साथ तक तक अपना ख्याल रखिये और जागरूक बनिए और देखते रहिये मीडिया दरबार

रिपोर्ट-पूजा पाण्डेय 

मीडिया दरबार 

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रामजन्म भूमि विवाद पर, ट्रस्ट क्यों बना हुआ है इतना शांत ! “सचिव बैद गुरु तिनी जौ प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तिनी कर होइ बोगिही नास” इन पंक्तियों के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने कहा हैं की लोभ लालच और सच न कहना किसी भी राज्य और कार्य के लिए बहुत ही हानिकारक और नुकसानदायक हो सकता हैं. आज जब लगभग 500 वर्षो के लम्बे आन्दोलन और संघर्ष के बाद रामलला वापस अपने मूल स्थान पर जाने के लिए तैयार थे और भगवान का मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो चूका था और ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण का कार्य सौ फीसदी की गति से पूरी इमानदारी से पूरा करने का प्रण लेकर कार्य कर रहा था. तभी फिर से इस राष्ट्रीय आस्था के विषय पर राजनीति शुरू हो गयी आरोप समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय और आम आदमी पार्टी के उत्तरप्रदेश प्रभारी सांसद संजय सिंह ने कुछ कागज़ दिखाते हुए यह लगाया की करोडो भारतीयों की राम आस्था के साथ भ्रष्टाचार हुआ हैं और जमीन खरीदने में अनियमिता बरती की गयी हैं और नियमो को ताक पर रख दिया गया हैं. शाम होते होते आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद गयी और सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता में पुरे कथित घोटाले के जांच की मांग कर डाली मामला बढ़ा तो शाम को श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा की ट्रस्ट को लेकर और उसकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा हैं जो राजनीति से प्रेरित हैं और जमीन खरीद में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नही हैं हालंकि उन्हें छोड़ ट्रस्ट से किसी अन्य व्यक्ति का कोई बयान इस मामले पर नही आया 15 बुधिजीवियो का ट्रस्ट लोगो की आस्था के साथ कथित छेड़-छाड़ पर हम स्टडी करेंगे पुरे मामले की, इसके अलावा कुछ नही कह पाया. जो ट्रस्ट पहले हर छोटी बड़ी बात को लेकर प्रेस वार्ता और प्रेस वक्तव्य जारी करता था आज उसने मौन धारण कर रखा हैं और करोडो राम भक्तो के आशंकित मन को राम भरोसे छोड़ रखा हैं,क्या यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी नही थी की जो आरोप प्रेस वार्ता कर ट्रस्ट पर लगाये गए है कथित प्रमाणों के साथ उनका जवाब भी ट्रस्ट द्वारा प्रेस वार्ता कर देना चाहिए था अगर सब कुछ ट्रस्ट के संज्ञान में था और पारदर्शी था तो? प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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