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         कोरोना पीडितो को 5 लाख की सहायता केजरीवाल सरकार की मदद या राजनितिक लिपा-पोती !

         कोरोना पीडितो को 5 लाख की सहायता केजरीवाल सरकार की मदद या राजनितिक लिपा-पोती !

कुछ दिन पहले तक का वो अस्पतालों के बाहर का मंजर तो नहीं भूलें होंगे आप की कैसे दिल्ली वासी अपने प्रियजनों की जान बचाने में अपने आप को लाचार महसूस कर रहे थे क्यूंकि महिना था मार्च और अप्रैल का जब दिल्ली में कोरोना की दूसरी लहर ने दस्तक दे दी थी और कोरोना की दूसरी लहर ने सरकार की सभी अव्यवस्था की पोल खोल कर रख दी थी और लोग ऑक्सीजन की कमी के कारण अपने प्रियजनों को खोते जा रहे थे उस समय कई याचिका न्यायलयो में दायर की गयी,मीडिया में रिपोर्ट्स आई और चर्चा शुरू हुई की सरकार की गलती की वजह से जिन लोगो ने अपने प्रियजनों को खोया उनको सरकार क्यों न मुआवजा दे, क्यूंकि जिन लोगो ने अपने प्रियजनों को खोया उनमे से कई ऐसे परिवार थे जिन्होंने अपना इकलोता कमाने वाला खो दिया |

इसलिए यह विषय बहुत गरमा गया और मीडिया दरबार ने भी इस प्रशन को दिल्ली के स्तर पर काफी जोर से उठाया और हमारे सहयोगी राजेश ने कई सवाल दिल्ली सरकार से दागे जिसके उपरांत आज दिल्ली सरकार ने यह आदेश पारित किया हैं की जिन लोगो ने अपने प्रियजनों को खोया हैं ऑक्सीजन की कमी से उन्हें सरकार 5 लाख का मुआवाजा देगी इसके लिए दिल्ली सरकार ने एक कमेटी का भी गठन किया हैं जो इस बाबत रिपोर्ट देगी. जिस भी परिवार को यह मुआवजा प्रदान किया जाएगा कमेटी यह चेक करेगी की क्या वाकई अस्पताल में उस कालखंड के दौरान ऑक्सीजन की कमी थी की नहीं, सप्लाई में कमी थी की नहीं स्टोरेज में ऑक्सीजन की उपलब्धता कितनी थी. इन सभी जांच के पूर्ण होने के बाद ही पीड़ित परिवार को मुआवजा मिलेगा.

अब आप खुद ही विचार कीजिये की सामूहिक दबाव की वजह से केजरीवाल सरकार ने मुआवजे का एलान तो कर दिया लेकिन क्या यह मुआवजा एक परिवार के लिए काफी हैं क्यूंकि जिन लोगो ने अपने स्वजनों को खोया हैं उसके लिए सिर्फ और सिर्फ राज्य की सरकार ही जिम्मेवार हैं क्यूंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय हैं और हम आपसे ही पूछेंगे की आप ने केंद्र से समय रहते सामजस्य बिठा कर क्यों नहीं राज्य में स्वास्थ्य संबंधी सुविधायो को बेहतर किया यहाँ हम केंद्र और राज्य की नूराकुश्ती में नहीं फसेंगे अब जब सरकार पर दबाव बढ़ा तो उसने दिल्ली के पीड़ित परिवारों की कीमत लगा दी 5 लाख रूपए वो भी तमाम तरह की जांच पूरी होने के बाद, अब आप जरा सोचिये एक परिवार जिसने अपना इकलोता कमाने वाला खो दिया क्या उसके पुरे परिवार का जीवन मात्र 5 लाख रूपए में चल सकता हैं,

क्या यह धनराशी इतनी हैं की एक परिवार जिसने अपना स्वजन खोया वो भी सरकार की बतोले बाज़ी और अवव्यस्था के कारण तो क्या सरकार को भी फिर इस विषय पर संजीदा हो कर विचार करने की आवश्कयता थी की नहीं और इतनी धनराशी का तो एलान करना चाहिए था की एक परिवार की मुसीबत कम हो सके और जिंदगी किसी की जिसने अपना इकलोता कमाने वाला खो दिया उस परिवार की थोड़ी आसन हो सके. क्यूंकि आप किसी की जान की कीमत कभी नहीं लगा सकते हैं, लेकिन अगर आप बिना दबाव आत्मीयता से उस परिवार की मदद करेंगे तो शायद उस परिवार का जीवन थोडा आसन हो जाता हैं और सरकार को मुआवजे की कीमत को कम से कम 21 लाख तय करने का प्रयास करना चाहिए था जिससे उनके फैसले में असल में मदद की भावना दिखती लेकिन अभी ऐसा लग रहा हैं की सरकार ने सिर्फ अपनी राजनितिक छवि को बचाने और कोर्ट और मीडिया रिपोर्ट्स के दबाव में आकर यह फैसला ले लिया हो,

अगले साल दिल्ली में निगम चुनाव भी हैं और केजरीवाल सरकार इन निगम चुनाव से बहुत उम्मीद लगा कर बैठी हैं तो हो सकता हैं की कही निगम चुनाव में लोग उनसे यह न पूछ ले की आप तो बहुत बड़ी बड़ी बाते करते थे अपने स्वास्थ्य मॉडल के बारे में लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने आपके स्वास्थ्य मॉडल के दावो के गुब्बारे की सब हवा निकाल दी और जब आपकी नाकामी उजागर हुई तो आप केंद्र से लड़ने लग गए और शमशान में दिल्ली वालो की लाशो का अम्बार लगा दिया, तो हम आपको निगम चुनाव में क्यों चुने और हमें जब अव्यवस्था ही झेलनी हैं तो पुराने वाले कौन से बुरे हैं तो हो सकता हैं निगम चुनाव में होने वाले संभावित नुक्सान से भी बचने के लिए केजरीवाल सरकार ने इस मदद की घोषणा कर दी.

लेकिन विचार करने वाली बात यह हैं की यह मात्र 5 लाख रूपए जो दिल्ली में राज्य सरकार की अव्यवस्था के कारण कोरोना काल के समय काल के ग्रास में समा चुके लोगो की कीमत तय की गयी हैं उसको भी पाने के लिए पीड़ित परिवार को मशकत करनी ही पड़ेगी यानी पहले ऑक्सीजन के लिए मशकत और फिर ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिस कारण आप अपने स्वजनों को खो देते है और उसके बाद मुआवजा पाने के लिए मशकत क्यूंकि आप दिल्ली में हैं जहा की सरकार के पास शायद अब दिल नहीं बचा हैं.

क्यूंकि इन्होने इस बार शमशान में इतनी लाशें देख ली हैं की इनकी संवेदनशीलता खत्म हो चुकी हैं नहीं तो अगर सरकार में लेश मात्र भी संवेदनशीलता बची होती तो वह इतना असंवेदनशील फैसला यानी एक इंसानी जान की कीमत मात्र 5 लाख रूपए न लगाती अब यह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा हैं की यह मुआवजे की राशि पीड़ित परिवार को आसानी से मिल जाती हैं या इसके लिए भी परिवार को ऑक्सीजन की तरह मशकत करनी पड़ेगी, देखना यह भी हैं की सरकार संभावित तीसरी लहर क्र लिए कितना तैयार हैं |

तीसरी लहर में भी दिल्ली लाशो के ढेर पर ही बैठे हुए दिखेगी की या स्वास्थ्य व्यवस्था आने वाले समय में सुधेरगी परिस्थिति जो भी बने हमारे माननीय अपने चांदनी महल में बैठ कर जनता द्वारा जीवन बचाने का संघर्ष देखेगी और कभी नेता जी बोर होंगे तो बाहर जा कर कभी ऑक्सीजन प्लांट का विजिट करते हुए फोटोशूट करा लेंगे या किसी अस्पताल का विजिट करते हुए फोटोशूट करा लेंगे लेकिन हो कुछ भी मरना राजनितिक पार्टियों के वोटरों को ही हैं क्यूंकि आज के दौर में जनता अब जनता नहीं बची सिर्फ वोटर बन कर रह गयी हैं. मीडिया दरबार केजरीवाल सरकार को सम्मान पूर्वक सलाह देना चाहती हैं की मुआवजे की राशि को 5 लाख से बढ़ा कर 21 लाख करे जिससे पीड़ित परिवार का जीवन वाकई सुगम हो पाए इस तरह के राजनितिक लिपा पोती से किसी भी आम जन का जीवन आसान नहीं होगा और शमशानों में यु ही लाशो के ढेर लगते रहेंगे.

आम जनता को भी चाहिए की कोरोना दिशा निर्देशों का सही से पालन करे और जब तक आवश्यक न हो घर से बाहर न निकले. अपना ख्याल रखिए और स्वस्थ रहिये और ताज़ातरीन खबरों के लिए देखते रहिये मीडिया दरबार धन्यवाद.

संपादक – राकेश मोहन सिंह

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रामजन्म भूमि विवाद पर, ट्रस्ट क्यों बना हुआ है इतना शांत ! “सचिव बैद गुरु तिनी जौ प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तिनी कर होइ बोगिही नास” इन पंक्तियों के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने कहा हैं की लोभ लालच और सच न कहना किसी भी राज्य और कार्य के लिए बहुत ही हानिकारक और नुकसानदायक हो सकता हैं. आज जब लगभग 500 वर्षो के लम्बे आन्दोलन और संघर्ष के बाद रामलला वापस अपने मूल स्थान पर जाने के लिए तैयार थे और भगवान का मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो चूका था और ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण का कार्य सौ फीसदी की गति से पूरी इमानदारी से पूरा करने का प्रण लेकर कार्य कर रहा था. तभी फिर से इस राष्ट्रीय आस्था के विषय पर राजनीति शुरू हो गयी आरोप समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय और आम आदमी पार्टी के उत्तरप्रदेश प्रभारी सांसद संजय सिंह ने कुछ कागज़ दिखाते हुए यह लगाया की करोडो भारतीयों की राम आस्था के साथ भ्रष्टाचार हुआ हैं और जमीन खरीदने में अनियमिता बरती की गयी हैं और नियमो को ताक पर रख दिया गया हैं. शाम होते होते आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद गयी और सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता में पुरे कथित घोटाले के जांच की मांग कर डाली मामला बढ़ा तो शाम को श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा की ट्रस्ट को लेकर और उसकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा हैं जो राजनीति से प्रेरित हैं और जमीन खरीद में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नही हैं हालंकि उन्हें छोड़ ट्रस्ट से किसी अन्य व्यक्ति का कोई बयान इस मामले पर नही आया 15 बुधिजीवियो का ट्रस्ट लोगो की आस्था के साथ कथित छेड़-छाड़ पर हम स्टडी करेंगे पुरे मामले की, इसके अलावा कुछ नही कह पाया. जो ट्रस्ट पहले हर छोटी बड़ी बात को लेकर प्रेस वार्ता और प्रेस वक्तव्य जारी करता था आज उसने मौन धारण कर रखा हैं और करोडो राम भक्तो के आशंकित मन को राम भरोसे छोड़ रखा हैं,क्या यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी नही थी की जो आरोप प्रेस वार्ता कर ट्रस्ट पर लगाये गए है कथित प्रमाणों के साथ उनका जवाब भी ट्रस्ट द्वारा प्रेस वार्ता कर देना चाहिए था अगर सब कुछ ट्रस्ट के संज्ञान में था और पारदर्शी था तो? प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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