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कोरोना महामारी के दौरान देश की सर्वोच्च न्यायालय चली छुट्टी पर|

कोरोना से डरकर देश की सर्वोच्च न्यायालय चली छुट्टी पर|

आज कोरोना के कारण देश का जो माहौल हैं वो किसी से छुपा नहीं है और इसी भयावह स्थिति को और अधिक गंभीर बनाने का काम कर रही हैं सरकारे जिन्हें लगतार चेतावनिया दी जा रही थी|

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कोरोना कि दूसरी लहर को लेकर उन्होंने पहले तो स्वास्थ्य व्यवस्था कि ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया इसेलेकर कोई तैयारिया नहीं कि ओर अब जब स्थितिया बेकाबू हो चुकी हैं तो अब ऐसे वक्त में भी वो जनता से सही आंकड़े छुपाने का काम कर रही हैं इसके अलावा कई राज्य सरकारे तो लगतार दावे कर रही हैं कि उनके राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं कि कोई कमी ही नहीं हैं|

मतलब इनकी माने तो श्मशान में जलती लाशे झूठी हैं अस्पतालों में पसरी चीख पुकार बनवाटी हैं सिर्फ और सिर्फ इनके दावे सच्चे हैं, ऐसे में कोरोना को लेकर लोगो के लिए सरकारों के इन झूठे दावों को लेकर सवाल करने का एक ही जरिया दिखता हैं वो हैं देश कि न्यायव्यवस्था| राज्य कि न्यायपलिकाये जितनी इस स्थिति को सम्भालने में नाकाम रही हैं राज्य कि अदलाते उतनी ही मुखर होकर लोगो के हितों कि रक्षा के लिए आगे आई हैं|

कई राज्यों की हाईकोर्ट्स ने कोरोना काल मे लिए बेहद अहम् फैसले

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कोरोना महामारी के इस दौर में कई हाईकोर्ट्स ने अपने विवेकाधीन काम करते हुए राज्य सरकारों से स्वत संज्ञान के जरिये कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं|

फिर चाहे हम दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले कि बात करे जिसके देर रात लिए गए एक फैसले ने मैक्स अस्पताल के मरीजों कि जान बचाई या मद्रास हाई कोर्ट कि जिसने चुनाव आयोग को हत्यारा बताने में जरा भी गुरेज नही किया|

लेकिन राज्य सरकारे इस मामले को लेकर जितनी प्रशंसा की पात्र हैं देश कि सर्वोच्च अदालत उतने ही निंदा कि, एक के बाद एक देश कि सर्वोच्च अदालत के कई फैसलों न उसे सवालों के घेरे में ला खडा किया हैं लेकिन इन सब के बीच अब एक और फैसला सामने आया हैं जो ऐसे वक्त में अपनी जीम्मेदारी छोड़ के भागने जैसा हैं|

दरसल खबर ये हैं कि कोविड संक्रमण की दूसरी लहर में तीव्र संक्रमण की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने अपना ग्रीष्मावकाश एक सप्ताह पहले यानी आठ मई से करने का फैसला किया हैं|

प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना ने पद ग्रहण करने के बाद अपने पहले कार्य दिवस पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन और बार काउंसिल आफ इंडिया सहित विभिन्न बार संगठनों के साथ बैठक में कोविड से उत्पन्न स्थिति पर विचार किया यहाँ आपको बता दें, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन ने कोविड संक्रमण की गंभीर स्थिति को देखते हुए सीजेआई से से शीर्ष अदालत का ग्रीष्मावकाश पहले शुरू करने का अनुरोध किया था।

14 मई की बजाय आठ मई से शुरू होगा शीर्ष अदालत का ग्रीष्मावकाश

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जिसके बाद हुई एक आपात बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब शीर्ष अदालत का ग्रीष्मावकाश 14 मई की बजाय आठ मई से शुरू होगा यानी साधारण सालों के मुकाबले एक हफ्ते पहले ही और ये जून कि 27 तारीख तक चलेगा।

यानी हर बार के मुकाबले इस बार कोरोना के कारण सर्वोच्च अदालत ने खुद ही खुद कि छुटी कि तारीख को पहले कर लिया| यहाँ हमारे स्वास्थ्यकर्मी हैं जो दिन और रात सबकों एक समझ के लगतार काम करने में लगे हुए हैं|

श्मशान में काम करने वाले लोग है जो रात तक लाशों का अंतिम संस्कार करने में लगे हुए हैं ऐसे समय में जरा सोचिये अगर ये भी अपनी जिम्मेदारियों से छुटी ले ले तो|

ऐसे माहौल में जब कोरोना से देश ग्रस्त हैं सबकी जिम्मेदारिया कई गुना बढ़ गई हैं क्या देश कि सर्वोच्च अदालत का ये फैसला कही से भी उचित हैं| सर्वोच्च न्यायलय के फैसलों पर राज्यों कि उच्च न्यायलयों ने अगर अनुकरण करना शुरू कर दिया तो जरा सोचिये कि स्थिति क्या होगी|

अब सवाल ये कि क्या देश कि सर्वोच्च अदालत होने के नाते सर्वोच्च अदालत कि ओर से लिया गया ये फैसला आपको कही से भी अनुकरणीय लगता हैं|

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ऐसे वक्त में सर्वोच्च अदालत का ये फैसला क्या आपकों देश कि वर्तमान जिम्मेदारियों से भागने जैसा नहीं लगता? कोरोना कि इस स्थिति को इमरजेंसी जैसा बताने के बाद कैसे देश कि सर्वोच्च संस्था खुद को इस इमरजेंसी के माहौल से अलग थलग कर सकती हैं|

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ऐसे समय में जब सत्ता लगभग बहरी हो चुकी हैं और अब न्यायव्यवस्था भी लगभग नींद कि गोलिया खा कर सोने जा रही हैं तो देश को जीवित रखने का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ आपके सवालों पर आ जाता हैं इसलिए सवाल करते रहिये, इससे पहले कि इस मरी हुई व्यवस्था कि लाशों से दुर्गन्ध आने लगे और आपका जीना दूभर कर दे, सवाल करिए|

रिपोर्ट – पूजा पाण्डेय 

मीडिया दरबार 

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रामजन्म भूमि विवाद पर, ट्रस्ट क्यों बना हुआ है इतना शांत ! “सचिव बैद गुरु तिनी जौ प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तिनी कर होइ बोगिही नास” इन पंक्तियों के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने कहा हैं की लोभ लालच और सच न कहना किसी भी राज्य और कार्य के लिए बहुत ही हानिकारक और नुकसानदायक हो सकता हैं. आज जब लगभग 500 वर्षो के लम्बे आन्दोलन और संघर्ष के बाद रामलला वापस अपने मूल स्थान पर जाने के लिए तैयार थे और भगवान का मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो चूका था और ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण का कार्य सौ फीसदी की गति से पूरी इमानदारी से पूरा करने का प्रण लेकर कार्य कर रहा था. तभी फिर से इस राष्ट्रीय आस्था के विषय पर राजनीति शुरू हो गयी आरोप समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय और आम आदमी पार्टी के उत्तरप्रदेश प्रभारी सांसद संजय सिंह ने कुछ कागज़ दिखाते हुए यह लगाया की करोडो भारतीयों की राम आस्था के साथ भ्रष्टाचार हुआ हैं और जमीन खरीदने में अनियमिता बरती की गयी हैं और नियमो को ताक पर रख दिया गया हैं. शाम होते होते आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद गयी और सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता में पुरे कथित घोटाले के जांच की मांग कर डाली मामला बढ़ा तो शाम को श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा की ट्रस्ट को लेकर और उसकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा हैं जो राजनीति से प्रेरित हैं और जमीन खरीद में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नही हैं हालंकि उन्हें छोड़ ट्रस्ट से किसी अन्य व्यक्ति का कोई बयान इस मामले पर नही आया 15 बुधिजीवियो का ट्रस्ट लोगो की आस्था के साथ कथित छेड़-छाड़ पर हम स्टडी करेंगे पुरे मामले की, इसके अलावा कुछ नही कह पाया. जो ट्रस्ट पहले हर छोटी बड़ी बात को लेकर प्रेस वार्ता और प्रेस वक्तव्य जारी करता था आज उसने मौन धारण कर रखा हैं और करोडो राम भक्तो के आशंकित मन को राम भरोसे छोड़ रखा हैं,क्या यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी नही थी की जो आरोप प्रेस वार्ता कर ट्रस्ट पर लगाये गए है कथित प्रमाणों के साथ उनका जवाब भी ट्रस्ट द्वारा प्रेस वार्ता कर देना चाहिए था अगर सब कुछ ट्रस्ट के संज्ञान में था और पारदर्शी था तो? प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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