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घरो में क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक चिंन्ह ! क्या है इसके फायदा ?

घरो में क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक चिंन्ह ! क्या है इसके फायदा ?

रिपोर्ट- रुचि पाण्डें, मीडिया दरबार

भारतीय संस्कृति में प्रतीकों का बड़ा महत्व है। हर एक प्रतीको के भीतर बहुत से गूढ़ रहस्य छुपे हुए है। इन प्रतीको के बारे में वहीं जान सकता है जो इन्हें बेहतर रुप से जानता हो। जो प्रतीको में विश्वास नहीं करते उनके लिए प्रतीक केवल प्रतीक ही रह जाते है। इन प्रतीको के अर्थ और महत्व को ज़रुर समझना चाहिए, तभी इनके लाभ उठाए जा सकते है।

प्रतीको की इस श्रेणी में स्वास्तिक भारतीय संस्कृति विशेषकर सनातन धर्म के भीतर बहुत महत्वपूर्ण माने जाते है। सनातन धर्म के अंदर स्वास्तिक के बहुत से लाभ बताऐ गए है- स्वास्तिक को आर्शीवाद देने वाला, मंगल या पुण्यकार्य करने वाला है। इसे शुभ या मांगलिक कार्यों एवं पुण्यकृतियों की स्थापना के रूप में प्रकट किया जाता है।

स्वास्तिक शब्द मूलभूत ‘सु + अस’ धातु से बना है। ‘सु’ का अर्थ कल्याणकारी एवं मंगलमय है, वहीं ‘अस’ का अर्थ है अस्तित्व एवं सत्ता। स्वास्तिक का अर्थ एक ऐसा अस्तित्व जो शुभ भावना से भरपूर और कल्याणकारी हो, जहाँ अशुभता और असमंगल कुछ भी ना हो। इसलिए स्वास्तिक को कल्याण की सत्ता और उसके प्रतीक के रूप में निरूपित किया जाता है।

अगर देखा जाऐ तो भगवान गणेश की मूर्ति को जिस प्रकार से रचा गया है उसमें गणेश की सूंड , हाथ , पैर और सिर की आकृति जिस प्रकार से दिखाऐ जाते है वो भी स्वास्तिक की चारो भुजाओ के रुप में दिखते है।  ‘ॐ’ को भी स्वास्तिक का प्रतीक माना जाता है। ‘ॐ’ ही सृष्टि के सृजन का मूल है, इसमें शक्ति, सामर्थ्य एवं प्राण जुड़ा हैं। ईश्वरीय शक्ति के लिए इसे ही सबसे अधिक सर्वोपरि माना जाता है।

स्वास्तिक का सबसे मूल अर्थ , मंगल और पुणय को ही बताया गया है। सभी दिशाओं में कल्याण हो, ऐसी भावना स्वास्तिक के प्रतीक से जुड़ा है। हिंदू शास्त्रों में भी स्वास्तिक के बहुत शुभ और कल्याणकारी लाभ बताऐ गए है।

 

दरअसल एक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में हमारे यहा कोई भी शुभ कार्य करने से पहले मंगलाचरण लिखा करते थे, पर यह सभी के लिए लिखना संभव नहीं था। पर जो भी इसका लाभ लेना चाहते थे उनके लिए श्रृषियों ने स्वास्तिक चिन्ह की परिकल्पना की ,

इसीलिए आज भी अगर कोई धार्मिक कार्य किया जाता है तो वेदी बनाकर अक्षत से स्वास्तिक को उकेरना मंगलमय माना जाता है। स्वास्तिक जहां भी उकेरा जाता है वहां की नकारात्मक उर्जा अपने आप ही नष्ट हो जाती है।

 

 

 

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