राष्ट्रीय

चलते मजदूर, बेबस सरकारें और बढ़ता कोरोना ……

24 मार्च, 2020 को जब प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का एलान किया था तब किसी ने इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि लॉकडाउन होते ही मजदूरों का इतने बडे स्तर पर पलायन शुरू हो जाएगा। सबसे पहले दिल्ली के आनंद विहार से तस्वीरे आना शुरू हुई थी। लाखों की तादाद में मजदूर पैदल ही आनंद विहार से सटे दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर इस उम्मीद से इक्कठे हो गए की यूपी और बिहार की सरकारे उनको घर लाने के लिए बसे भेजेगी। कोरोना से बचने के लिए जिस सोशल दुरी का जिक्र किया गया था वो नदारद था। दिल्ली की सरकार ने भी मजदूरों को रोकने से अच्छा, उन्हें घर वापस भेजना उचित माना होगा इसीलिए डीटीसी की बसे लगा कर जो भी मजदूर दिल्ली में पैदल चल रहे थे उन्हें दिल्ली बॉर्डर पर छोड़ दिया। यूपी सरकार ने कुछ मानवता का परिचय दिया और वाकई में कुछ बसे चला ही दी थी। इस तरह की तस्वीरे धीरे-धीरे बाकी शहरों और राज्यों से आने लगी थी। मजदूरों को घर जाने के लिए बसे मिली तो ठीक वरना हालत के आगे मजबूर मजदूरों ने पैदल यात्रा ही शुरू कर दी थी। कई मजदूरों के चलते-चलते या सड़क हादसे में या ट्रेन से कटकर मरने की खबर भी आई लेकिन सरकारों का ध्यान इस तरफ आते आते ही आधे से ज्यादा मजदूर अपने घर पहुँच चुके थे। केंद्र सरकार ने ट्रेने चलायी भी लेकिन मजदूरों से टिकट के पैसे लेने की खबरों ने इसे राजनीतिक मुद्दे में परिवर्तित कर दिया।

तो देखा जाए इस लॉकडाउन में सरकारों से ज्यादा सक्रिय बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद ही नजर आये थे, लेकिन वो सरकार नहीं है और उनके पास संसाधन भी सीमित है और पूरे देश के मजदूरों की व्यथा वो ही सुलझा देंगे, ये उम्मीद रखना भी गलत है। केंद्र सरकार ने कई महतवपूर्ण निर्णय लेते हुए, मजदूरों के लिए राशन, और भत्ते का इन्तेजाम कर दिया था। जब केंद्र सरकार को इस बात का आभास हुआ कि एक बड़ा मजदूर वर्ग तो पहले ही गाँव जा चुका है तब केंद्र ने अपनी नीति में बदलाव किया। 20 जून, 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा “गरीब कल्याण रोजगार योजना” का शुभारम्भ किया गया। इस योजना के तहत देश के 116 जिले जहाँ से मजदूर मुख्य रूप से पलायन करते है, वह जिले मजदूरों को रोजगार देने में सक्षम हो पाए। इसके लिए 50,000 करोड़ रुपये की राशि ऐसे 25कार्यक्षेत्रों में खर्च किये जायेंगे, जिसमे काम करने के लिए मजदूरों को अपना गाँव नहीं छोड़ना पड़ेगा। शुरूआती दौर में इस योजना को चलाने का प्रावधान 6 राज्यों में था। उन 6 राज्यों में अगले 125 दिनों तक प्रवासी श्रमिको को लिए सहायता को मिशन मोड में चलाया जा रहा है। इस बीच सरकार द्वारा राष्ट्रीय रोजगार नीति पर काम तेज़ी से बढाया गया और इसमे 50 करोड़ मजदूरों को संघठित क्षेत्रों में लाने का प्रावधान बनाया गया था।

तो क्या मजदूरों को रोजगार मिला?

इस बात की पुष्टि तो कर पाना मुश्किल है कि मजदूरों को रोजगार मिला या नहीं और अगर मिला तो कितनो को मिला और कितने समय तक का रोजगार मिला? लेकिन हां ये तो कहा ही जा सकता है की सबको रोजगार नहीं मिला या कहिये ज्यादातर को रोजगार नहीं ही मिला होगा। क्यूंकि अगर सबको रोजगार मिलता या घर के पास ही मिलता तो मजदूर वापस बडे शहर नहीं आते।

26 जून को एक प्रेस वार्ता में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव ने कहा कि यह बहुत ही प्रोत्साहित करने वाली बात है की कुछ ट्रेनें जो यूपी, बिहार और बंगाल से वापस आ रही है, उसमे खाली सीटो की संख्या घट रही है। इसका मतलब लोग वापस आ रहे है यानी जो लोग गए है वो ही वापस आ रहे होंगे, नए लोग तो घुमने इस कोरोना के दौर में आ नहीं रहे होंगे। 9 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी श्रमिको की स्थिती जानने के लिए केंद्र और राज्यों को तलब किया था। कोर्ट की सुनवाई के दौरान, बिहार सरकार के वरिष्ठ वकील रंजित कुमार ने माना की पटना से रिवर्स माइग्रेशन शुरू हो चुका है। केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस बात को स्वीकार किया कि मजदूर वापस आ रहे है क्युकी लॉकडाउन खत्म हो गया है, अर्थव्यवस्था खुल रही है, अब माहौल स्वस्थ है। तो जो मजदूर लॉकडाउन क कारण वापस गए और अब वो वापस आ रहे है, चाहे ट्रेन से या बस से या पैदल, तो रोजगार मिला किसे? और जैसे जैसे अनलॉक आगे बढेगा तो लगभग सब मजदूर वापस आ ही जायेगे, तो केंद्र सरकार की योजना का क्या लाभ हुआ? ये कुछ सवाल है जो आपके और हमारे से ज्यादा उन मजदूरों के मन में रह जायेगे, जिनके लिए ये रोजगार योजना बनायीं गयी थी।

बढता कोरोना

वहीँ देश में कोरोना पूरी रफ़्तार से बढ़ रहा है। अब देश नए में कोरोना केसों की संख्याहर रोज़ 60,000 से ज्यादा आने लगे है। लेकिन सरकारें अब आपको संख्या नहीं 138 करोड़ की आबादी के हिसाब से आ रहे प्रतिशत को कामयाबी बता रही है। 47,000 से ज्यादा लोगो की मौत तो वैसे भी प्रतिशत में कम ही आएगी। लेकिन लोगो को परसेंटेज में काउंट करने की प्रथा है, अब वो चाहे चुनाव में हो या कोरोना मामले हो। सरकारें कुछ भी कहे आप लोग अधिक से अधिक सावधानी रखिये क्योंकि सरकारों के लिए आप और आपकी ज़िन्दगी बस एक आंकड़ा भर हो सकती है लेकिन आप अपने परिवार के लिए कितने जरुरी है ये आप ही बेहतर जानते है।

रोहित मिश्रा – मीडिया दरबार

देश और दुनिया कि ताज़ातरीन खबरों के लिए जुड़े रहिये – मीडिया दरबार

शेयर करें
COVID-19 CASES