अंतर्राष्ट्रीय

चीन के हाथों बिक गया नेपाल का लोकतंत्र ?

चीन का लोकतंत्र एक बार फिर सवालों के घेरे में

नेपाल में जारी सियासी संग्राम और राजनीतिक उथल पुथल के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली दो तरफा खेल खेलते नज़र आ रहें हैं। केपी शर्मा ओली दरअसल अपने विदेश मंत्री को भारत भेज रहें है।

नेपाल के विदेश मंत्री को भारत भेजने के पीछे क्या हैं मंशा?

नेपाल में जारी सियासी तनातनी की कहानी तो हमने आपको बताई थी , साथ ही भारत नेपाल सीमा विवाद को लेकर चल रहे तनाव से भी हमने आपको अवगत करवाया था। लेकिन अब एक बार फिर चीन के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली दो तरफा खेल खेलते नज़र आ रहें है।

दरअसल केपी शर्मा ओली जो एक तरफ अपने देश में राजनीतिक सामंजस्य नहीं बैठा पा रहें है तो वहीं दूसरी तरफ वह नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली को भी भारत भेज रहें है। ओली ने कहा कि ग्यावली 14 जनवरी को भारत पहुंचेंगे। इस यात्रा के दौरान वे भारत के साथ नक्शा विवाद पर बात करने वाले है।

पर सावल यहां उठ रहा हैं कि जहां एक तरफ नेपाल में ओली अपने देश में और राजनीति में शांति स्थापित करने में नाकामयाब हो रहें है तो ऐसे में भारत में अपने विदेश मंत्री को भेजने के पीछे वे क्या चाह रहें है। पूरी दुनिया ने देखा की किस प्रकार नेपाल के आंतरिक मामलों में चीन ने हस्तक्षेप किया हैं।

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अभी हाल ही में नेपाली संसद में जब ओली के प्रति सासंदों में अविश्वास पैदा हो गया था तब भी केपी शर्मा ओली ने अपने विदेश मंत्री को भेज मामले को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया था। ओली पर हमेशा से ही चीन के ज़रुरत से ज्यादा नज़दीकी रखने का आरोप लगता रहा है। सवाल यहां ये भी हैं कि कही ओली अपनि सरकार के बहकावे में आकर दो तरफा राजनीति तो नहीं कर रहें?

ओली ने जनसमर्थन को जुटाने के लिए जनता को बहकाया

केपी शर्मा ओली ने हमेशा से जनसमर्थन जुटाने और जनता के लुभाने के लिए यह कहा कि वह भारत से मीटिंग कर कालापानी, लिंपियाधुरा औऱ लिपुलेख क्षेत्र का कब्जा अपने हाथ में लेने की प्रक्रिया पर काम कर रहें है। ओली ने तो यहां तक कहा हैं कि सुगौली समझौते के मुताबिक महाकाली नदी के पूर्व पर स्थित ये तीनों क्षेत्र नेपाल के ही है।

वे भारत के साथ बातचीत कर इन सभी क्षेत्रों को अपना कब्ज़ा लेने के लिए पूरी कोशिश कर रहे है। चीन के साथ नेपाल के संबध कैसे हैं इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता हैं, जिस वन बेल्ट वन रोड परियोजना का भारत ने विरोध किया हैं उसका नेपाल ने साथ दिया हैं ,जबकि नेपाल की बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की अर्थव्यवस्था पर निर्भर है।

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इतना ही नहीं जब ओली ने चीन का दौरा किया था तब उन्होंने ट्रांजिट ट्रेड समझौते पर सहमति जताते हुए हस्ताक्षर किए थे। इस तरह ये देश लगातार नेपाल को लालच देकर भारत के खिलाफ भड़काता रहता हैं पर नेपाल को चीन के साथ दोस्ती को बढ़ाने से पहले एक बार श्रीलंका का उदाहरण ज़रुर देखना चाहिए और केवल श्रीलंका ही क्यों चीन ने दुनिया के बहुत से देशों को लूटा है।

श्रीलंका, मालदीव और म्‍यांमार जैसे देश इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार-  चीन की बहुत सी कंपनियो ने बहुत से देशों को 150 से ज्यादा ट्रिलियन डॉलर का कर्ज़ दिया हैं।

आखिर कब तक नेपाल चलेगा चीन की चाल ?

चीन हमेशा से ही इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने का लालच देकर देशों को अपने झांसे में फंसा लेता हैं। धीरे धीरे वह देशों के संसाधनों पर कब्जा करना शुरु कर देता है।

श्रीलंका, मालदीव बहुत से देश ऐसे हैं जो चीन के कर्ज तले दबे हुए हैं। नेपाल को चीन के साथ बढ़ते अपने संबधों को लेकर एक बार ज़रुर सोचना चाहिए , चालाक चीन के हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहिए।

अब भारत के साथ एक बार फिर सीमा विवाद पर बातचीत करने के लिए नेपाल को उकसाने में चीन का ही हाथ माना जा रहा है। अब यहां यह देखना दिलचस्प होगा की आखिर नेपाल अपना अगला कदम क्या उठाऐगा, औऱ कब तक यूं ही चीन के हाथों की कठपुतली बना रहेंगा।

रिपोर्ट- रुचि पाण्डें

मीडिया दरबार

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