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चीन से उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रो को क्या हैं खतरा ?

चीन से उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रो को क्या हैं खतरा ?

 

चीन

image source : social media

लद्दाख के बाद अब उत्तराखंड के बाडाहोती में चीनी सेना की गतिविधियाँ बढ़ने की खबर सामने आने के साथ से ही उत्तराखंड पुलिस ने भी अपना सुरक्षा तंत्र सक्रीय कर दिया | गुरुवार को उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय देहरादून में पुलिस के आला अधिकारियों के बैठक हुई| बैठक में आईआईटीपी और एसएसपी समेत केन्द्रीय व राज्य से जुड़े ख़ुफ़िया विभाग के अधकारी भीं शामिल हुए| आखिर में तय यह हुआ कि केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियां आपस में तालमेल बैठाकर सीमांत इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम करेंगी।

अभी कुछ दिन पहले ही स्थानीय लोगों के हवाले से बताया जा रहा है कि बाड़ाहोती क्षेत्र में 40 से अधिक सैनिक पहुंचे थे, जबकि घोड़े में सवार कुछ सैनिक होतीगाड़ तक पहुंचे। कुछ देर वे यहां रुके। वहीं, चीन के सैनिकों की गतिविधियों की खबर लगते ही प्रदेश सरकार ने अपनी खुफिया एजेंसियों को चौकस कर दिया है। हालांकि उत्तराखंड पुलिस ने साफ किया कि बाड़ाहोती में चीन सेना के ऐक्टिव होने की उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली है।

लेकिन बताया गया है कि चीन और नेपाल से लगी सीमा पर उत्तराखंड पुलिस के जवान आईटीबीपी और एसएसबी के साथ मिलकर पेट्रोलिंग करने की भी तैयारी कर रहे हैं। बताया गया है कि हर तीसरे महीने चीन और नेपाल सीमा पर तैनात आईटीबीपी और एसएसबी के अधिकारियों के अलावा इंटेलिजेंस ब्यूरो से जुड़े अधिकारियों के साथ होने वाली यह बैठक कोरोना की वजह से लंबे वक्त से नहीं हुई थी। बैठक का उद्देश्य जहां सीमांत इलाकों की सुरक्षा को पुख्ता करना होता है, वहीं राज्य और केंद्रीय फोर्स के बीच आपसी समन्वय बनाना भी होता है।

आइये जानते है भारत के लिए उत्तराखंड की सुरक्षा इतनी आवयशक क्यों है

भारत के लिए उत्तराखंड की सुरक्षा इतनी आवयशक क्यों है हिमालय सदियों से भारत की अभेद्य सुरक्षा दीवार रहा है, लेकिन यहां स्थित दर्रों से कई बार चीन भारत को आंखें दिखाता रहा है.उत्तराखंड की चीन से लगी सीमा पर बड़ाहोती विवाद इसका उदाहरण है. भारत के लिए सामरिक दृष्टि से इन दर्रों का काफी महत्व है.

चीन ने अपनी सीमा पर अत्याधुनिक सुविधाओं का ढांचा खड़ा कर दिया है और भारत आज भी उत्तरकाशी से पिथौरागढ़ तक करीब साढ़े तीन सौ किमी हिमालय की सुरक्षा दीवार को मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है. उत्तराखंड से लगी चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर यूं तो हिमालय भारत के लिए सुरक्षा दीवार का कार्य करता है, लेकिन जमीनी हकीकत में इस क्षेत्र में भारत चीन से काफी पीछे है.

ऐसा इसलिए, क्योंकि आज भी उत्तराखंड की सीमांत घाटियों में सामरिक दृष्टि से सुविधाओं का विकास नहीं हो सका है, जिससे इन क्षेत्रों से गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं. महाहिमालय में स्थित इन दर्रों से गुजरना इतना आसान नहीं है.

ये दर्रे हैं वो जिनका नाम हम आपको बता रहे है – पिथौरागढ़-बेल्चाधुरा दर्रा, ऊटाधुरा दर्रा, लिपुलेख दर्रा, निखर्चू चमोली गढ़वाल-माणा दर्रा, नीति दर्रा, टिमरसैंण दर्रा और बाड़ाहोती उत्तरकाशी-निलांग दर्रा. इन दर्रों की ऊंचाई समुद्र तल से साढ़े 14 हजार से लेकर करीब साढ़े 18 हजार फीट तक है. पिथौरागढ़ स्थित लिपूलेख दर्रा सबसे कम ऊंचाई पर स्थित है,

जबकि माणा और ऊटाधुरा दर्रे की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग सत्रह हजार फीट से अधिक है. इन दर्रों को पार करने का एक निश्चित समय होता है.बर्फीली हवाओं के कारण इन दर्रों पर खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है. साल के 12 महीने यहां बर्फ रहती है और कोहरा अधिक होने के कारण यहां विजिबिलिटी भी काफी कम हो जाती है|

तिब्बत क्षेत्र के इन सभी इलाकों में चीन ने बिजली, संचार और सड़क का व्यापक ढांचा खड़ा कर दिया है. भारत सामरिक दृष्टि से चीन से काफी पीछे है और पिथौरागढ़ का लिपुलेख, बाड़ाहोती और जादूंग दर्रे से चीन कभी भी आक्रमण कर सकता है, लेकिन भारत सरकार उत्तराखंड के सीमांत इलाकों की ओर कोई ध्यान नही दे रही है. मुन्स्यारी से मिलम गांव के लिए 56 किमी सड़क आज तक नहीं बन सकी है, जबकि करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं.

यही हाल धारचूला से आगे गुंजी और कुंटी गांव का है. सीमांत इलाकों की उपेक्षा होती रही तो भविष्य में फौज के बाद दूसरी पंक्ति में खड़े स्थानीय रक्षक गायब हो जाएंगे. ओर इसी वजह से उत्तराखंड के कुछ गाँव में अतिक्रमण का खतरा हमेशा मडराता रहेगा| चीन का आक्रमण और सुरक्षा बेहद मजबूत है,और भारत को भी चीन के बरर्बर अपनी सेवाओं को मजबूत करना होगा इसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है ढांचागत सुविधाओं का विकास|

साफ है की चीन से लगी सीमाओं में आधारभूत ढांचा जुटाने में केंद्र सरकार कितनी गंभीर है| गंभीर है, इसका एक नमूना मुन्स्यारी में स्थित भारत का अंतिम गांव मिलम और व्यास घाटी में लिपूलेख दर्रे तक बन रही सड़क से लगाया जा सकता है, जहां करोड़ों खर्च होने के बाद भी बीआरओ सड़क नहीं पहुंचा सका. देश की सीमाओं की निहेगबानी में लगे हमारे जवान दिन-रात अपनी जान की परवाह किए बगैर सुरक्षा में मुस्तैद हैं.

ऐसे में अगर उत्तराखंड से लगी सीमाओं पर केन्द्र सरकार ने जल्द ढांचागत सुविधाएं विकसित नहींं की तो भविष्य में चीन की हरकतें लद्दाख की तरह उत्तराखंड में भी बढ़नी शुरू हो सकती हैं, जिसकी बानगी कुछ महीने पहले चीन बाड़ाहोती क्षेत्र में दिखा चुका है.

 

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रिपोर्ट : नेहा परिहार

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