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दिल्ली सरकार ने इस फैसले के जरिये की दिल्ली हाई कोर्ट को रिश्वत देने की कोशिश |

दिल्ली सरकार ने 5 स्टार होटल में तैयार किये 100 क्वारंटाइन कमरे

इस समय कोरोना कि चौथी लहर से जूझ रही दिल्ली का हाल इतना बुरा हो चूका हैं कि अस्पतालों में बेड से लेकर शमशानों में लाशे जालने तक कि जगह दिल्ली के लोगो को नसीब नही हो पा रही हैं|

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लेकिन ऐसे समय में दिल्ली सरकार ने एक पांच सितारा होटल में 100 कमरों को क्वारंटाइन सेंटर में तबदील  करने का आदेश जारी किया हैं, देश का दिल कहे जाने वाली देश कि राजधानी जो इस वक्त कोरोना का एपीसेंटर बना हुआ हैं|

कोरोना के कारण दिल्ली में एक तरह से दहशत का माहौल हैं यहाँ लोगो को डर कोरोना से संक्रमित होने का नहीं नहीं उनके अन्दर डर इस बात का हैं कि संक्रमित होने के बाद वो क्या करेंगे इलाज़ के लिए उन्हें बेड मिलेगा या नही कही ऑक्सिजन के बिना उनकी भी तो सांसे नहीं थम जानेंगी|

कही उनके अपनों को भी तो उनके लिए शमशान के बाहर घंटों लम्बी लाइनो में खडा तो नही होना पड़ेगा , ऐसे ही सवालो और डर से इस वक्त लगभग पूरा देश जूझ रहा हैं दिल्ली के हालात भी लगतार गंभीर बने हुए हैं|

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिक विपिन सांघवी ने 22 अप्रैल को दिल्ली के अस्पतालों में बेड्स कि किल्लत से जुड़े एक केस कि सुनवाई करते हुए कहा था कि मरीजों कि संख्या में चार गुनी वृद्धि  हो रही हैं लोगो को बेड नहीं मिल रहे हैं सड़क पर खड़े आम आदमी को तो छोड दीजिये अगर मैं भी एक बेड मांगू तो, मुझे भी आसानी से नहीं मिलेगा|

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से की विशेष क्वारंटाइन सेंटर कि अपील

दिल्ली सरकार
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जस्टिस संघवी का कहना एक हद तक सही भी था दिल्ली कि स्थितिया कुछ ऐसी ही हैं और अब शायद इसी को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पहले से ही अपनी सुरक्षा के इंतजामात करने कि अपील कर दी|

अब ऐसे समय में हर किसी को अपनी और अपने अपनों कि चिंता होना लाजमी हैं इसमें क्या बड़ी बात हैं लेकिन इस अपील के बाद दिल्ली सरकार ने जो किया वो आज का मुद्दा हैं|

कोर्ट ने तो चलो सरकार से मांग कि लेकिन सरकार जिसका जिम्मा होता हैं सबकों एक समान नज़रों से देखे उनके लिए समान हित वाले फैसले ले|

उस सरकार ने ऐसे समय में भी पद के हिसाब से सहूलियतों का बटवारा करनी कि रिवायत को बरकरार रखा और दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्तियों, न्यायिक अधिकारीयों और उनके परिवारों के लिए कोविड अस्पताल के रूप में राजधानी के पांच सितारा अशोका होटल के 100 कमरे बुक कर डाले|

एक दिन में खर्च होंगे पांच लाख रुपये

दिल्ली सरकार
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यहाँ आपकों बता दे कि ये वो सरकार हैं जो सत्ता में आते वक्त वादे कर के आई थी कि हम राजनीती से VVIP कल्चर को ख़त्म करेंगे लालफीताशाही के विरोध के साथ आई सरकार का दावा था कि ये आम आदमी कि सरकार हैं|

तो दिल्ली कि आम आदमी कि सरकार ने ऐसे VVIP कल्चर को ख़त्म किया हैं आज ऐसी स्थिति में भी इनका VIP ट्रीटमेंट जारी हैं, इसे लेकर एक निर्देश जारी करते हुए दिल्ली सरकार कि ओर से कहा गया कहा कि दिल्ली स्थित अशोका होटल के 100 कमरों को कोविड हेल्थ सेंटर में परिवर्तित किया जाएगा|

जहां उनके स्वास्थ्य संबंधी चीजों का ध्यान रखा जाएगा, इसके लिए दिल्ली सरकार ने Primus हॉस्पिटल को अशोका होटल में कोविड हेल्थ सेंटर चलाए जाने की जिम्मेदारी दी है|

यानि यहाँ हॉस्पिटल स्टाफ कि जिम्मेदारी प्राइमस हॉस्पिटल कि होगी और इसका खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी, इस पांच सितारा होटल में एक दिन का खर्च प्रतिव्यक्ति 5000 रूपए तक आएगा| यानी अगर एक का यहाँ हम हिसाब लगाये तो यहाँ एक दिन का पांच लाख रुपये खर्च आएगा|

दिल्ली सरकार पर लोगो ने लगाये रिश्वत देने के आरोप

खैर ये सवाल तो वो थे जो यहाँ दिल्ली सरकार पर उठाये जा रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ हमारी दिल्ली हाई कोर्ट जो लगतार अपने फैसलों से राज्य और केंद्र सरकार को फटकारती आ रही थी आज अपने इस एक फैस ले से खुद सवालों के घेरे में हैं|

“ये प्रिविलेज क्यों ? क्या ये रिश्वत नही है दिल्ली कोर्ट को? आम जनता को बेड तक नही मिल रहे और दिल्ली हाईकोर्ट को पांच सितारा होटल !कोई मीडिया इस मुद्दे को उठाएगा? नही उठाएगा!आम जनता इसका घोर विरोध करे!”

एक अन्य ने यूजर ने लिखा न्यायपालिका और राजनेता हमारे देश में सबसे अधिक लाभान्वित वर्ग हैं हमारा देश अब एक लोकतंत्र नहीं रहा अब ये न्यायतंत्र बन चूका है, न्यायतंत्र ही यहाँ सब कुछ तय करता हैं क्रिकेट से लेकर स्वास्थ्य, धर्म, पर्यावरण, सुरक्षा और वो सब कुछ जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं|

एक और यूजर ने लिखा कि “कल तक सरकार ऑक्सीजन सप्लाय के लिए रो रही थी और दिल्ली के लोग आज भी बेड्स के लिए मस्कत कर रहे हैं यहाँ तक कि जो डॉक्टर्स जिस हॉस्पिटल में काम कर रहे हैं उन्हें वहां भी बेड नहीं मिल पा रहा अगर ऐसा ही डॉक्टर्सने किया होता तो अभी लोग हड़ताल कर रहे होते|”

एक और यूजर ने लिखा “जब सरकार की तरफ से न्यायाधीशों और उनके परिवार के लिए 5 सितारा होटल में VIP स्वास्थ्य सुविधा व्यवस्था की जाएगी और देश की आम जनता को अस्पतालों के बाहर दम तोड़ना पड़ेगा और शमशान में शव जलने की वेटिंग चल रही हो तो। ऐसे में कहना ही पड़ेगा सरकार यमराज है न्याय कठघरे में है।”

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इस तरह लोगो ने केजरीवाल सरकार को इस मामले में जमकर घसीटा और उन्हें बेहद खरी खोटी सुनाई, कोरोना काल में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जूझ रहे लोगो का गुस्सा सोशल मीडिया पर फूट पड़ा और उन्होंने दिल्ली सरकार को जमकर सुनाया|

 

रिपोर्ट- पूजा पाण्डेय 

मीडिया दरबार 

 

 

 

 

 

 

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रामजन्म भूमि विवाद पर, ट्रस्ट क्यों बना हुआ है इतना शांत ! “सचिव बैद गुरु तिनी जौ प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तिनी कर होइ बोगिही नास” इन पंक्तियों के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने कहा हैं की लोभ लालच और सच न कहना किसी भी राज्य और कार्य के लिए बहुत ही हानिकारक और नुकसानदायक हो सकता हैं. आज जब लगभग 500 वर्षो के लम्बे आन्दोलन और संघर्ष के बाद रामलला वापस अपने मूल स्थान पर जाने के लिए तैयार थे और भगवान का मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो चूका था और ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण का कार्य सौ फीसदी की गति से पूरी इमानदारी से पूरा करने का प्रण लेकर कार्य कर रहा था. तभी फिर से इस राष्ट्रीय आस्था के विषय पर राजनीति शुरू हो गयी आरोप समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय और आम आदमी पार्टी के उत्तरप्रदेश प्रभारी सांसद संजय सिंह ने कुछ कागज़ दिखाते हुए यह लगाया की करोडो भारतीयों की राम आस्था के साथ भ्रष्टाचार हुआ हैं और जमीन खरीदने में अनियमिता बरती की गयी हैं और नियमो को ताक पर रख दिया गया हैं. शाम होते होते आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद गयी और सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता में पुरे कथित घोटाले के जांच की मांग कर डाली मामला बढ़ा तो शाम को श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा की ट्रस्ट को लेकर और उसकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा हैं जो राजनीति से प्रेरित हैं और जमीन खरीद में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नही हैं हालंकि उन्हें छोड़ ट्रस्ट से किसी अन्य व्यक्ति का कोई बयान इस मामले पर नही आया 15 बुधिजीवियो का ट्रस्ट लोगो की आस्था के साथ कथित छेड़-छाड़ पर हम स्टडी करेंगे पुरे मामले की, इसके अलावा कुछ नही कह पाया. जो ट्रस्ट पहले हर छोटी बड़ी बात को लेकर प्रेस वार्ता और प्रेस वक्तव्य जारी करता था आज उसने मौन धारण कर रखा हैं और करोडो राम भक्तो के आशंकित मन को राम भरोसे छोड़ रखा हैं,क्या यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी नही थी की जो आरोप प्रेस वार्ता कर ट्रस्ट पर लगाये गए है कथित प्रमाणों के साथ उनका जवाब भी ट्रस्ट द्वारा प्रेस वार्ता कर देना चाहिए था अगर सब कुछ ट्रस्ट के संज्ञान में था और पारदर्शी था तो? प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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