अंतर्राष्ट्रीय

दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेड डील में शामिल होने से भारत ने किया इंकार

दुनिया में सबसे बड़ी ट्रेड डील पर कई बड़े देशों ने हस्ताक्षर कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है, पर भारत ने इस ट्रेड डील से खुद को दूर रखा है। क्या है इसके पीछे भारत की मंशा जो इतनी बड़ी ट्रेड डील में भारत उसका हिस्सा नहीं बना चीन सहित एशिया प्रशांत के करीब 15 देशों ने रविवार को भाग लिया और दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेड डील पर वर्चुअल हस्ताक्षर किए। इस समझौते द्वारा इन देशों के बीच क्षेत्रीय वृहद आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) करार हुआ है। हस्ताक्षर करने वालें सभी देशों ने यह उम्मीद जताई की इससे शामिल हुए सभी देशों को कोविड -19 महामारी के कारण मिलें आर्थिक झटकों उबरने में सहायता मिलेंगी। लेकिन हैरानी की बात है कि भारत ने खुद को इस समझौते से दूर रखा है।

आरसीईपी का अर्थ

आरसीईपी की औपचारिक वार्ता सन् 2012 में कंबोडिया में आयोजित 21वें आसियान शिखर सम्मेलन में हुई थी। इस वार्ता द्वारा चीन आसियान के मुंक्त व्यापार समझौते को अगले स्तर पर ले जाने का ही एक कदम है। इस आरसीईपी यानी क्षेत्रिय व्यापक आर्थिक भागीदारी संधि के तहत चीन ने अपने बाज़ार को विश्व व्यापार के लिए और अधिक उदार बनाने की मंशा है। इस समझौते में आसियान में शामिल 10 देशों के अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड भी शामिल है। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इस समझौते से भारत के लिए कई तरह की परेशानियां भी खड़ी हो सकती है। यह आरसीईपी समझौता चीन के लिए बहुत अहम साबित हो सकता है। क्योंकि चीन इसमें सबसे बड़ा साझेदार है। चीन द्वारा आरसीईपी में ज्यादा दिलचस्पी लेने के पीछे एक कारण यह भी है कि क्योंकि अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति की ओर से चीन आशा कर रहा है कि वह चीन को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति को वापस नहीं लेंगे।

दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेड डील से भारत ने स्वंय को रखा दूर

इस समझौते को लेकर करीब आठ साल से वार्ता चल रही थी, लेकिन भारत ने अपने व्यापारिक हितों को देखते हुए आरसीईपी में शामिल नहीं हुआ है। आगर भारत इस संधि में साझेदार बनता तो इसमें शामिल होने के लिए भारत को अपना बाजार खोलना पड़ता है, जिससे चीन से सस्ते उत्पादों का आयात बढ़ने की आशंका थी और चीन से सस्ते आयात बढ़ने से घरेलू उद्योग व कारोबार पर असर पड़ने की संभावना बनी हुई थी। जानकारों के अनुसार अगर भारत अपने बाज़ार को शामिल देशों के लिए खोलता तो इससे भारत के घरेलू कृषि व डेयरी से संबंधित कारोबार पर भी असर पड़ने की संभावना थी। आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से सस्ते मिल्क पाउडर व अन्य दुग्ध उत्पादों के आनें से देश के किसानों और डेयरी व्यापारियों को नुकसान होने की संभावना थी। पर अब सवाल उठता हे कि क्या भारत द्वारा इस प्रकार इतनी बड़ी ट्रेड डील से खुद को दूर रखना क्या सही है? क्योंकि इस नई व्यापार संधि के मुताबिक़, आरसीईपी अगले बीस सालों के भीतर कई तरह के सामानों पर सीमा-शुल्क ख़त्म करेगा।

संधि के उद्देश्य

इस संधि के तहत बौद्धिक संपदा, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएं, ई-कॉमर्स और व्याव्सायिक सेवाएं शामिल होंगी। इस संधि में किस प्रोडक्ट का उत्पादन किस देश में हुआ है, इन जैसे नियम प्रभाव डाल सकते है, पर जो देश इस संधि का हिस्सा है, उनमें कई देशों के बीच मुक्त-व्यापार को लेकर पहले से ही समझौता मौजूद है। भारत के लिए यह संधि व्यापर के नए मौके तलाशने के नज़रिए से भी महत्वपूर्ण है। भारत में विदेशी निर्माण उद्योग में निवेश करने के लिए भी यह संधि अहम हो सकती है।

भारत के लिए चुनौती

एक दूसरा कारण यह भी है कि भारत में उपभोक्ताओं के खरीदने की क्षमता बढ़ रही है। पर वैश्विक स्तर पर यह अभी भी कम ही है। अगर किसी विदेशी कंपनी को भारत में आकर निर्माण करना है, तो उसे निर्यात करने का भी काफ़ी ध्यान रखना होगा क्योंकि भारत के घरेलू बाज़ार में ही उसकी खपत हो जाये, यह अभी थोड़ा मुश्किल लगता है.” इसके अलावा इस महत्वपूर्ण संधि से भारत खुद को दूर रख अपनी आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए कौन सा कदम उठाएगा यह तो समय के साथ साफ हो जाएगा और इसके साथ यह भी देखना अहम होगा कि क्या भारत स्वंय को चीन की व्यापारिक नीतियों से कब तक दूर रख पाता है।

रूचि पाण्डें

मीडिया दरबार

 

शेयर करें
COVID-19 CASES