विचार

फ्रीडम हाउस 2021 की रिपोर्ट का दावा भारत में लोकतंत्र में आई कमी

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भारत को लेकर किये गए झूठे दावे

हमारे देश में लोकतंत्र और उस लोकतंत्र में लोगों की स्वतंत्रा को लेकर बहस कोई नई बात नहीं हैं आये दिन हमारे देश में लोग लोकतंत्र की गरिमा को तार तार करते रहते हैं जिसे जैसे समझ आता हैं वो इसे अपने हिसाब से इस्तेमाल करता हैं|

फ्रीडम हाउस
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कभी हमारी राजनीतिक पार्टिया इसे अपना राजनीतिक खिलौना बना लेती हैं तो कभी इसी लोकतंत्र के दम पर मिलने वाले आन्दोलन के अधिकार का फायदा उठाकर देश में दंगों जैसी स्थितिया पैदा करने की कोशिश की जाती हैं|

लेकिन इतना सब अगर आपको काफी नहीं लगता तो अब आपके लिए एक और खबर हैं जो भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाती हैं दरसल अमरीका स्थित फ्रीडम हाउस नाम की एक एनजीओ ने भारत में लोकतंत्र की हालिया स्थिति का आकलन कर अपनी रिपोर्ट दी हैं|

अमेरिका स्थित एक थिंक टैंक है फ्रीडम हाउस

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के बाद अब देश में लोकतंत्र की हालिया स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर ज्ञानीजानो की चर्चा एक बार फिर तेज़ हो गई हैं|

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लेकिन सोशल मीडिया पर अपना ज्ञान बाँटने वाले ज्ञानीजनो के बारे में चर्चा करने से पहले आपको फ्रीडम हाउस और इसके काम के बारे में थोड़ी से जानकारी दे देते हैं

तो जैसा की हमने पहले ही आपको बताया था फ्रीडम हाउस अमेरिका की एक एनजीओ हैं जो की दुनियाभर के देशो में लोकतंत्र की स्थिति पर नज़र रखने का काम करती हैं|

और किसी भी अन्य संस्था की तरह हर साल अपने आकड़ों के आधार पर देशो को रैंकिंग देती हैं| हालाँकि ये संस्था पिछले 15 सालों से ये काम कर रही हैं लेकिन इस साल इसकी चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही कयोंकि इस साल इस संस्था ने भारत में लोकतंत्र को स्वतंत्र की कैटगरी से निकाल कर आंशिक रूप से स्वतंत्र की कटेगरी में डाल दिया हैं|

भारत के स्कोर में क्यों आई कमी

डेमोक्रेसी अंडर सीज के शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में भारत को इस साल 100 में से 67 का स्कोर दिया हैं जबकि ये स्कोर पिछली बार 71 था यानी हमारे देश का स्कोर पहले के मुकाबले कम हुआ हैं और अगर आपको इस रिपोर्ट के बारे में सुन कर देश में लोकतंत्र की स्थिति पर शक हो रहा हैं तो इसे पढने के बाद तो आप इस बात को पूरी तरह मानने लगेगे की भारत में अब लोकतंत्र बचा ही नहीं हैं |

क्युकी फ्रीडम हाउस 25 बातों के आधार पर Global Freedom Index बनाता है,  जिनमें राजनीतिक स्वतंत्रता, नागरिकों के मौलिक अधिकार, स्वतंत्र मीडिया, विरोध प्रदर्शन का अधिकार, विदेशी एनजीओ को काम करने की आज़ादी और स्वतंत्र चुनाव का मुद्दा आदि शामिल किये जाते है और इस बार फ्रीडम हाउस ने इन सभी मापदंडों पर भारत को कम ही रेटिंग दी है|

क्या हैं फ्रीडम हाउस के दावे का आधार?

मतलब आप इसे कुछ ऐसे समझिये की हमारे लगभग हर सब्जेक्ट में से मार्क्स काटे गए जिसके कारण हमारा कुल स्कोर कम हुआ हैं|

लेकिन अगर आप इस एनजीओ के आकड़ों को स्कोर को तरीके से देखे तो आपको कुछ पता लगेगा की कैसे इन आकड़ों को घुमाने की कोशिश की गई हैं|

रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में लोकतंत्र हैं बरकरार

फ्रीडम हाउस
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यहाँ ध्यान से समझने पर आपको पता चलेगा की भारत को राजनीतिक अधिकारों की स्वतंत्रता के लिए 40 मे से 34 अंक दिए गए और नागरिकों की स्वतंत्रता के अधिकारों के मामले में यहाँ हमें 60 में से 33 नबर दिए गए|

ये स्कोर देख कर आपको ऐसा नहीं लगता जैसे कोई शिक्षक किसी बच्चे को अपने सब्जेक्ट मे सिर्फ इसलिए फ़ैल कर दे क्युकी वो उसे पसंद नहीं करता|

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खैर अगर अब भी आपको ये समझ नहीं आया तो आप यहाँ एकबार अमेरिका का स्कोर देखिये फ्रीडम हाउस ने अमेरका को 100 में से 83 स्कोर दिए हैं जबकि इतना तो हम और आप भी देख चुके हैं की बीते कुछ समय में अमेरिका में लोकतंत्र सड़कों पर था सबसे पुराने लोकतंत्र का दम भरने वाले अमेरिका की सरेआम कैसे खिल्लिया उडी थी लेकिन इतने पर भी उसे 83 स्कोर देना और भारत को 67 क्या मतलब बनता हैं न न दिमाग पे इतना जोर मत डालिए इसका मतलब हम आपको समझाते हैं|

अमेरिका करती हैं 80 प्रतिशत तक की फंडिंग

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देखिये जैसे किसी स्कूल में जिस बच्चे के पापा स्कूल के किसी बड़े पद पर हो या डोनेशन अच्छी खासी देते हो तो ऐसे में टीचर मार्क्स भी तो उसी बच्चे को अच्छे देंगे हां तो आप इसे ऐसे समझिये की अमेरिका यहाँ वही बच्चा है| आपको यहाँ बता दे की फ्रीडम हाउस को उसकी कुल फंडिंग का 80% पैसा अमेरिका से मिलता हैं अब ऐसे में अमेरिका के कैपिटल हिल में कुछ भी हो लोकतंत्र तो वहा अछूती ही रहेगी न|

खैर ये तो रही अमेरिका में स्थित और अमेरिका द्वारा पोषित एनजीओ की रिपोर्ट की बात लेकिन आप जो भारत के नागरिक हैं जो इस लोकतंत्र का हिस्सा हैं इस लोकतंत्र में रह रहे हैं अगर आपसे कोई पूछे तो आप आज के भारत को अपनी ओर से कितना स्कोर देंगे इसपर विचार कीजिएगा |

रिपोर्ट -पूजा पाण्डेय 

मीडिया दरबार 

 

 

 

 

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