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भारत के कानून क्यों नहीं करते पुरुष हित की बात

पूजा पाण्डेय

मीडिया दरबार

भारत में अगर आप महिलाओं के खिलाफ हिंसा की बात करे तो आपको पचासो ऐसे कानून मिलेंगे जो देश की महिलाओं के हितो और हिंसा के खिलाफ उनकी रक्षा के लिए बनाए गए है लेकिन एक बार के लिए ज़रा आप देश के पुरुषों के साथ होने वाले हिंसा के विषय में सोचिये क्या आपको एक भी ऐसा कानून याद आता है जो पुरुषों के हितों की रक्षा का प्रावधान करता हो, नहीं हमारे देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो देश के पुरषों के हितों की रक्षा की बात करता हो|

देश की सर्वोच्च अदालत ने घरेलु हिंसा के दोषी कों किया बरी

आप सोच रहे होंगे की हम आज पुरुषों के हक की बात अचानक क्यों कर रहे है न तो आज इंटरनेशनल मेंस डे है और न ही देश के पुरुषों से जुडा कोई अन्य खास दिन|

बात दरअसल ये है की, हाल ही में देश की सर्वोच्य अदालत ने एक केस में 498अ के तहत दोषी पाए गए एक वयक्ति को बेनिफिट ऑफ़ डाउट यानि सन्देह की स्थिति का लाभ देते हुए उसकी ट्रायल कोर्ट और छतीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल की सजा से बरी कर दिया गया हैं|

498अ के तहत हुई थी 10 साल की सजा

देश की टॉप कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर कुछ बीती बातो और  कानून के दुष्प्रयोग  की तरफ हमारा ध्यान खीचा है जो आपके लिए भी जानना बेहद जरुरी है|

भारत में रोज़ाना लगभग 242 आदमी आत्महत्या करते है | इसमें 84 घरेलु परेशानियों के चलते और 11 लव अफेयर के चलते अपनी जान देते है एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते 20 सालो में करीब 6 करोड लोग 498अ   के तहत पीड़ित दर्ज किये गए है |

अदालतों में आज भी 498अ के कई मुकदमे लंबित हैं और कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें यह माना गया कि इस धारा का महिला पक्ष द्वारा इसका दुरुपयोग हुआ है। यह कानून आपराधिक है परन्तु इसका स्वरूप पारिवारिक है। पारिवारिक किसी भी झगड़े को दहेज़ प्रताड़ना के विवाद के रूप में परिवर्तित करना अत्यंत ही सरल है। एक विवाहिता की केवल एक शिकायत पर यह मामला दर्ज़ होता है। परिवार के सभी सदस्यों को अभियुक्त मान कर उनपर कार्यवाही शुरू कर दी जाती है और सभी अभियुक्तों को जेल में भेज दिया जाता है क्योंकि यह एक गैर ज़मानती और बेहद असंयोजित अपराध है।

देश में घरेलु हिंसा के कानून का होता है दुस्प्रयोग

एक औसत के अनुसार घरेलु हिंसा के हर केस में कम से कम चार लोगों को आरोपी बनाया जाता है घरेलू हिंसा के इन मामलों में करीब 40 फीसदी पीड़ित आदमी होते है|

हमारा सुप्रीम कोर्ट भी कह चूका है की देश में दर्ज अधिकतर रेप और घरेलु हिंसा के केस फर्जी होते है आंकड़ों के अनुसार 78 फ़ीसदी रेप केस बदले की भावना से दर्ज कराये जाते है|

भारत एक पितृसतात्मक समाज है एक ऐसा समाज जहा के हर वर्ग हर तबके की सत्ता हमारे पुरुषों के हाथ में होती है| इसलिए शुरुआती दौर में महिलाओ के हितों की रक्षा करना हमारे लिए आवश्यक भी था जिसपर विचार करते हुए कई कानूनों कों अमल में लाया गया जो महिलाओ के हक की बात करते है इसमें सबसे बड़ा और अहम् रोल रहा 2005 में आये घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम  हालाँकि इससे पहले दहेज़ के विरुद्ध और अन्य कई कानून लाये जा चुके थे पर पी.डब्ल्यू.डी.वी.ए 2005 के आने के बाद भारत में घरेलु हिंसा के खिलाफ जैसे अंधी सी आ गई|

एन.सी.आर.बी द्वारा जारी आकडे को देखे तो 2019 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4,05,861 मामले दर्ज किए गए, 2018 में जहा ये मामले 3,78,236  थे 1 वर्ष के अंतराल में इनमे 7.3%  की वृद्धि हुई और अभी कोरोना वायरस महामारी के दौरान घरेलु हिंसा के मामले में काफी बढोतरी दर्ज की गई है।  यह बात सच है कि महिला उत्पीड़न और दहेज़ के खिलाफ एक सख्त कानून की ज़रूरत हमें है, लेकिन इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए भी कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। आज कितने ही पुरुष इस धारा का शिकार हुए हैं और उनका जीवन खराब हुआ है। कई संगठन इस धारा के दुरुपयोग के खिलाफ अपनी लड़ाई भी लड़ रहे हैं।

भारत सरकार ने भी इन फर्जी मुकदमों की बढ़ती संख्या देखते हुए धारा 498अ में संशोधन की आवश्यकता को समझा है, लेकिन फिलहाल इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। हालांकि हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा के अंतर्गत सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगाई है। बीते साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना निरोधक कानून की धारा 498 ए के हो रहे दुरुपयोग को रोकने के लिए व्यापक दिशानिर्देश भी जारी किए थे। अब दहेज प्रताड़ना के मामले पुलिस के पास न जाकर एक मोहल्ला कमेटी के पास जाएंगे, जो उस पर अपनी रिपोर्ट देगी। कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही पुलिस देखेगी कि इसपर आगे कानूनी कार्रवाई की जाए या नहीं।

जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने उत्तरप्रदेश के एक मामले में दिए अपने फैसले में कहा था कि धारा 498अ को कानून में रखने का मकसद पत्नी को पति या उसके परिजनों के हाथों होने वाले अत्याचार से बचाना था। वह भी तब जब ऐसी प्रताड़ना के कारण पत्नी के आत्महत्या करने की आशंका हो।

अदालत ने कहा कि यह चिंता की बात है कि विवाहिताओं द्वारा धारा 498अ के तहत बड़ी संख्या में मामले दर्ज कराए जा रहे हैं। स्थिति को हल करने के लिए हमारा मत है कि इस मामले में सिविल सोसाइटी को शामिल किया जाए, ताकि न्याय के लिए प्रशासन को कुछ मदद मिल सके। यह भी देखना होगा कि जहां वास्तव में समझौता हो गया है, वहां उचित कदम उठाया जाए। इससे पक्षों को इसे समाप्त करने के लिए कोर्ट न जाना पड़े।

 

 

 

 

 

 

 

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