राजनीति

योगी सरकार मुख्तार अंसारी पर कार्यवाही कर पक्की करेंगे चुनावी ज़मीन ?

योगी सरकार का विकास गुप्ता के बाद नया शिकार

उत्तर प्रदेश और योगी सरकार का नाम सुनते ही दिमाग में जो चीज़े मुख्य रुप से आती है, उनमें सबसे पहले ये कि यूपी की सियासत ने देश को कई दिग्गज नेता दिए है, यूपी का पूर्वांचल इसमें सबसे महत्वपूर्ण है।

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लेकिन इस पूर्वांचल का एक काला सच भी है, वह है अपराध और राजनीति का गठजोड़। इसी कारण पूर्वांचल के कई माफियाओं और गुंडो ने संसद तक सफर तय किया है। अपराध की दुनिया से राजनीति की दुनिया में कदम रखने वालो में ही शामिल है नाम मुख्तार अंसारी का।

माफिया की दुनिया में रॉबिनहुड और बाहुबली के नाम से पहचान रखने वाले मुख्तार अंसारी की जिंदगी भी किसी बॉलीबुड की मूवी से कम नहीं है।

40 से भी अधिक मुकदमें मुख्तार के नाम है

योगी सरकार
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कौन है ये बाहुबली और क्या है इसका फैमली बैकग्राउडं, और किन मामलों के तहत मुख्तार अंसारी पर मुकदमा चल रहा है, सब बताऐंगे आपको विस्तार से- मुख्तार अंसारी का जन्म यूपी के गाज़ीपुर जिले में हुआ था।

राजनीति से गठजोड़ तो उन्हें बचपन से ही मिल गया था। इनके दादा मुख्तार अहमद अंसारी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे थे। उनके पिता कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे।

इतना ही नहीं भारत के पिछले उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी मुख्तार के रिश्ते में चाचा लगते हैं।  कॉलेज के दिनों से मुख्तार अंसारी का झुकाव माफिया की दुनिया की ओर हो गया था।

मुख्तार अंसारी पर चल रहें मुकदमों की लिस्ट की बात करें तो, 40 से भी अधिक मुकदमें मुख्तार के नाम है, वे करीब 14 साल से जेल में बंद है। इन सब के बावजूद पूर्वांचल में इसने अपनी धाक जमाऐ रखी।

अपने भाई अफजाल की सियासी तैयारी से लेकर बेटे का सियासत में स्वागत तक मुख्तार ने अपना भरपूर योगदान दिया। साल 2005 में भी मुख्तार अंसारी बहुत चर्चा में रहें थे क्योंकि बीजेपी के कद्दावर विधायक कृष्णांनद राय के हत्याकांड मामले में उन्हें बरी कर दिया गया था। मुख्तार अंसारी पर कृष्णानंद राय की हत्या की साज़िश रचने का आरोप था।

राजनीति में कदम रखने का सफर सबसे पहले 1970 में शरु हुआ जब सरकार ने विकास के लिए कुछ योजनाएं शुरु की, लेकिन 90 के दशक तक आते आते मुख्तार ने जमीन कब्जाने के लिए अपनी गैंग का काम शुरु कर दिया।

यही उनके सामने खड़े थे बृजेश सिहं यहीं से मुख्तार और बृजेश के बीच गैंगवार शुरु हुई थी। साल 1988 में एक हत्या का मामला सामने आया जिसमें आरोप मुख्तार पर लगाया गया, हालांकि मुख्तार के खिलाफ कोई ठोस कदम ना उठाया जा सका, लेकिन उस वक्त अंसारी चर्चा में आए थे।

तब तक वह ठेके और जमीन के कारोबार के ज़रिए अपराध की दुनिया में कदम रख चुका था। यूपी के मऊ, वाराणसी, गाज़ीपुर और जौनपुर में तो उसके नाम से ही लोग कांपने लगे।

साल 1966 में मुख्तार ने पहली बार राजनीति में कदम रखा

 

राजनीति में मुख्तार अंसारी ने राजनीति में अपना पहला कदम रखा। 1996 में मुख्तार अंसारी पहली बार विधानसभी चुनाव के लिए चुने गए थे। जिसके बाद उन्होंने बृजेश सिंह को धूल चटाने का काम शुरु किया।

2002 के आते आते वह पूर्वांचल में सबसे खतरनाक गिरोह बन गया। इसके बाद मुख्तार अंसारी अकेले गैंगलीडर की छवि में दिखे। पंजाब की रोपण जेल में बंद अंसारी को बार बार योगी ने यूपी की जेल में भेजने के लिए सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया। अब व यूपी की जेल में भेजा जा रहा है।

पिछले 14 सालों से मुख्तार अलग अलग केस में जेल में ही बंद है। मुख्तारर क खिलाफ करीब 40 से अधिक मामलें दर्ज है। फिर भी पूर्वांचल में धाक इतनी की जेल में बैठे बैठे ही चुनाव जीतते है, और अपनी गैंग का संचालन करते है। 2005 में जेल में रहते हुए ही मऊ में हिंसा भड़काने का आरोप लगा था, और इतना ही नहीं बीजेपी नेता कृष्णांनंद राय के सात साथियों समेत राय की हत्या की आरोप भी अंसारी पर ही है।

योगी सरकार की चुनावी ज़मीन मजबूत

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ठेकेदारी, स्कैप, शराब की तस्करी, ज़मीन का ठेका सब पर केवल अंसारी का ही कब्जा है। लेकिन इसके बावजूद अंसारी के चाहने वालों का मानना है कि वह रॉबिनहुड है, अगर अमीरों से लूटते है तो गरीबों में बाँटते है।

मुख्तार ने अपनी दबंगई से सड़कों, पुल और अस्पतालों और साथ ही स्कूल कॉलेजों पर अपने मुनाफे का करीब 20 गुना अधिक खर्च किया है। लखनऊ में हिन्दूवादी नेता कमलेश तिवारी की नृशंस हत्या हो, कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों को मारने वाले विकास दुबे का एनकाउण्टर हो या फिर विधायक विजय मिश्रा पर नकेल इन सभी घटनाओं के बाद योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताकर बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया में अभियान चलाया गया था|

ये चर्चा अब कहीं नहीं होती बाहुबली धन्नंजय सिंह, अतीक अहमद और मुख्तार अंसरी पर चोट करके योगी सरकार ने इस मिथक को झूठा करार दे दिया है उसने बता दिया है कि बाहुबलियों पर कार्यवाही जाति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि चौतरफा की जायेगी।

2022 में विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनावी माहौल शुरु होने में अब 6 महीने से भी कम समय बचा है। ऐसे में योगी सरकार चुनावी समर में उतरने से पहले ये जता देना चाहती है कि उसने सत्ता संभालने के समय योगी सरकार ने जो वायदा किया था, उसे पूरा कर दिया है।

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2017 में  योगी सरकार ने अपराधियों पर तगड़ी नकेल कसने की बात कही थी अब जब वे 2022 के चुनावी रैलियों में उतरेंगे तो सीना ठोककर कह सकेंगे कि कितने बाहुबलियों को धूल चटाई।

रिपोर्ट- रुचि पाण्डें

 मीडिया दरबार

 

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