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राजद्रोह (124ए) देश को बचाने या अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का हथियार !

राजद्रोह (124ए) देश को बचाने या अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का हथियार !

राजद्रोह (124ए)
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राजद्रोह (124ए) भारत में औपनिवेश वाद ने काफी लम्बे समय तक अपना अधिपत्य काबिज रखा और एक लम्बे संघर्ष के बाद देश ने आजादी का सवाद चखा था। लेकिन ब्रितानिया हुकूमत तो देश से 1947 में चली गयी लेकिन देश में छोड़ गए उनके द्वारा रचित औपनिवेशक कानून जिसका आज भी प्रयोग प्रबल तरीके से हो रहा हैं। राजद्रोह (124ए)

उन कानून की आज के दौर में कितनी प्रासंगिकता हैं यह आज बहस का विषय हैं जिसकी शुरुआत माननीय उच्चतम न्यायलय ने कर दी हैं। बीते सप्ताह एक याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय उच्चतम न्यायलय ने कहा की राजद्रोह कानून किसी सुतार को दी उस आरी की तरह हैं जिसको आरी तो इसलिए दी गयी थी की वह खराब हो चुके पेड को काटकर सुंदर फर्नीचर बनाये, लेकिन उसने पूरा जंगल काट दिया हो ऐसा प्रतीत होता हैं। राजद्रोह (124ए)

मुख्य न्यायधीश ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा की क्या हमें आज के दौर में जब देश को आजाद हुए 75 वर्ष बीत चुके हैं क्यों नहीं बाकि गैर जरूरी कानूनों की तरह इसको भी निरस्त कर देना चाहिए। इस पर सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल ने कहा की कानून को निरस्त करना सही नहीं होगा निरस्त करने से बेहतर यह हैं की इस कानून के बाबत नए दिशा-निर्देश लागु किये जाए जिससे इस कानून का उद्देश्य तय किया जा सके और इसका सार्थक प्रयोग मुक्कमल किया जा सके। राजद्रोह (124ए)

भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 से 2019 के छह वर्षो के अंतराल के बीच धारा 124ए के तहत कुल 326 केस दर्ज किये गए जिसमे कुल 559 लोगो को गिरफ्तार किया और सजा हुई मात्र 10 लोगो को ही। इस कानून के तहत सबसे अधिक मामले असम में दर्ज किये गए हैंराजद्रोह (124ए)

कई मामलो में जाच संस्था चार्जशीट भी न्यायलय के सामने पेश नहीं कर पायी, यही कारण हैं की अब इस कानून की उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं। उच्चतम न्यायलय ने कहा की सरकार को समझना होगा की सरकार के विरोध में उठने वाली हर एक आवाज़ राजद्रोह नहीं हो सकती है, हमें विरोध और राजद्रोह के बीच का फर्क समझना होगा।राजद्रोह (124ए)

राजद्रोह का यह कानून ब्रिटिश हुकूमत द्वारा वर्ष 1870 में लाया गया और जब यह कानून का अधिक विरोध हुआ तो ब्रिटिश हुकूमत ने वर्ष 1977 को अपने देश से इस कानून को निरस्त कर दिया और उसके बाद विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र सयुक्त राष्ट्र ने भी इस कानून को अपने यहाँ से विधि आयोग के माध्यम से निरस्त कर दिया और इन दोनों ही राष्ट्रों में यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर रद्द किया गया।राजद्रोह (124ए)

लेकिन भारत में संविधान का दूसरा संशोधन ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के लिए हुआ था। राजद्रोह और देशद्रोह दोनों ही एक सरीके के कानून हैं ओर दोनों के भीतर ही दंड संहिता 124ए के तहत सजा सुनाई जाती हैं और कार्यवाही सुनिश्चित की जाती हैं।राजद्रोह (124ए)

राजद्रोह का मामला विधि द्वारा स्थापित सरकार, नीति तथा प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध असंतोष की भावना फैलाने से है। जबकि देशद्रोह राष्ट्र के प्रति असम्मान, राष्ट्र की एकता – अखंडता के विरुद्ध किया गया कार्य तथा राष्ट्रीय संस्कृति और विरासत को पूर्णतया नकारना है।राजद्रोह (124ए)

अतः राजद्रोह शासन के खिलाफ किया गया आचरण है, जबकि देशद्रोह राष्ट्र के खिलाफ। लेकिन एक बेहतर ओर मजबूत लोकतंत्र के लिए विर्मश संवाद और तथ्य आधारित बहस होना किसी भी विषय पर अति आवश्यक हैं तभी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र विश्व पटल पर एक जीवट लोकतंत्र का उदाहरण पेश कर पायेगा।

सरकार निर्माण का सफर सत्ता के गलियारो से होकर गुजरता हैं और सत्ता में जो सरकार हैं वह किसी न किसी राजनितिक पार्टी से सरोकार रखती ही हैं। कोई भी पार्टी यह नहीं चाहती की उसके सरकार की अधिक आलोचना हो चाहे वह किसी भी रूप में हो ओर इसलिए देखा जाता हैं की इस तरह के कानून का वर्चस्व अधिक बढ़ जाता हैं।राजद्रोह (124ए)

औपनिवेशवाद की पहचान यह कानून आजादी के समय भी लोगो की आवाज़ को दबाने का प्रयास करता हैं और आज भी कर रहा हैं।ब्रितानिया हुकूमत ने इस कानून का प्रयोग उस समय के पत्रकारों, नेताओ और समाजसेवी कार्यकर्ताओ की आवाज दबाने के लिए किया था, जिसके शिकार गाँधी से तिलक सब हुए जो भी ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ बोलता उसको इस कानून के तहत जेल में ठूस दिया जाता था ओर भारत में सबसे पहला राजद्रोह का मुकाबला वर्ष 1891 में संपादक जोगेंद्र चन्द्र बोस पर हुआ।

क्यूंकि हुकूमत को कभी भी अपना गन्दा चेहरा दिखाने वाला व्यक्ति और संस्था पसंद नहीं आती उसे जो शक्ति सत्ता द्वारा प्राप्त होती हैं उसका वह बेजा इस्तेमाल कर उस उठती आवाज को दबा देना चाहती हैं। ओर उठती आवाजो को इस तरह दबा देने का प्रचलन हर दौर में देखा गया चाहे वो भारत का गरीबी हटाओ का दौर हो या सबका साथ या सबका विश्वास का दौर हो।राजद्रोह (124ए)

लेकिन सत्ता के खिलाफ उठने वाली आवाजो को किसी भी सत्ता ने पसंद नहीं किया। राजद्रोह के मामले में सबसे अधिक शक्ति विधायिका और कार्यपालिका के पास हैं ओर विधायिका का इशारा मिलते ही कार्यपालिका अपने काम में लग जाती हैं और जो भी सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोले बैठा हैं उसको तत्काल प्रभाव से उठाकर जेल में डाल दिया जाता हैं ओर यह एक गैरजमानती अपराध हैं इसमें 3 वर्ष से आजीवन कारावास तक का प्रावधान है |

न्यायलय इसमें तब तक सुनवाई नहीं करता जब तक व्यक्ति जिस पर यह धारा लगायी जाती हैं उसको न्यायलय के सामने पेश न किया जाए इसलिए भी सत्ता जिन आवाजो को पसंद नहीं करती उनको इस धारा के तहत जेल में डाल सत्ता की शक्ति का एहसास दिला देती हैं की या तो आवाज़ खुद ब खुद शांत हो जाए या सत्ता के बूट के आवाजो के पीछे दब जाए। राजद्रोह (124ए)

1962(केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य) के एक बहुचर्चित मसले जो आजाद भारत का पहला राजद्रोह का मुकदमा था उस पर कार्यवाही करते हुए उच्च्तम न्यायलय ने देश और राजद्रोह में फर्क परिभाषित किया और कहा की सत्ता के खिलाफ बोलना राजद्रोह नहीं हो सकता हैंराजद्रोह (124ए)

हमें यह समझ लेने की आवश्यकता हैं की इस देश का लोकतंत्र तब तक ही जिवित हैं जब इस देश के संविधान का मूल ढाचा और जब तक देश में सत्ता से सवाल, उसकी आलोचना ओर शासको को बदलने का आधारभूत संरचना जीवित रहेगी तभी तक इस देश का लोकतंत्र भी जीवित हैं। राजद्रोह (124ए)

आलोचना ओर सवाल के बिना सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह और गतिशील बनाना लगभग नामुमकिन हैं और निरंकुश शासन कभी भी देश की जनता को एक बेहतर कल नहीं दे सकता हैं। इस धारा को तोप की तरह अपने हथियार घर में जरूर रखे लेकिन इसको चूहों मारने के लिए प्रयोग न करे और सत्ता को भी ज्ञात होना चाहिए की सत्ता से मिली शक्ति का निरंकुश, मनमाने और बिना उद्देश्य प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए नहीं तो लोकतंत्र पतन की और अग्रसित हो जाता हैं । राजद्रोह (124ए)

जिस उच्चतम न्यायलय ने जो कानून का कोर्ट पहन कर इस जनहित याचिका पर सुनवाई की और अपने निर्णय में यह लिखा की यह कानून औपनिवेशवाद की देन हैं तो संभवत वह कोर्ट भी औपनिवेशवाद की ही देन हैं। राजद्रोह (124ए)

सत्ता को समझने की जरूरत हैं की सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट बनाने के कई कारणों में से एक कारण यह भी था की पुरानी संसद औपनिवेशवाद की याद है या वह अंग्रेजो की दें हैं और आजाद भारत का प्रतिनिधि ब्रितानिया हुकूमत की बनायी संसद में क्यों बैठे तो फिर आखिर क्यों आजाद भारत की जनता जनार्धन ब्रितानिया हुकूमत के निरंकुश कानून के तहत सत्ता द्वारा कुचली जाए।    राजद्रोह (124ए)

संपादक-राकेश मोहन सिंह

 

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