Uncategorized राजनीति

राजनितिक वंशवाद संकेत है राजतंत्र का

बिहार विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में बीजेपी और बीजेपी सहयोगी पार्टीयों के कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया।  साथ ही पीएम मोदी ने अपने भाषण के दौरान यह कहा की देश में बड़े दुर्भाग्य से कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला परिवारवाद पार्टियों का जाल लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पीएम ने कहा की देश का युवा भली प्रकार जान गया है कि परिवारवादी पार्टीयां लोकतंत्र के लिए खतरा है। आपको बता दें की देश में वंशवाद, परिवाद की राजनीति के लिए हमेशा से ही नेहरु-कांग्रेस को ही ज़िम्मेदार ठहराया गया है। क्योंकि आजादी के बाद वंशवाद को बढ़ाने का आरोप सबसे पहले नेहरू गांधी परिवार पर लगा क्योंकि इसके तीन सदस्य, जवाहर लाल नेहरू, बेटी इंदिरा गांधी और इंदिरा के बेटे राजीव गांधी, देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. आज जब राजीव के बेटे राहुल गांधी, कांग्रेस की इस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश में जी जान से जुटे हैं वहीं बहन प्रियंका वाड्रा भाई का साथ देने मैदान में कूद पड़ी हैं। माना जाता है कि देश में सबसे अधिक परिवाद वाद को बढ़ावा कांग्रेस ने ही दिया है। और यही कारण है कि आए दिन सोशल मीडिया पर कांग्रेस द्वारा परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए आलोचना की जाती है।

भारत में भिन्न पार्टीयों में व्याप्त है वंशवाद

भारत देश में उत्तर से लेकर दक्षिण तक पार्टीयों में परिवार वाद समाया है। हाँ वह बात अलग है कि सभी पार्टीयों ने समय को देखते हुए कुछ बदलाव ज़रुर किए है और कुछ पार्टीयां इन बदलावों को करने में नाकामयाब भी रही है। भारत में नेहरू गांधी के बाद अगर दूसरा नाम जिस पार्टी को परिवाद के बढ़ावे के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है वह है जम्मू और कश्मीर के दिवंगत मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्लाह। शोख अब्दुल्ला की भी वंशवाद के लिए बहुत आलोचना की जाती है। क्योंकि जम्मू कश्मीर में उनके बेटे फारुख अब्दुल्लाह और पोते ओमर दोनों राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इसी प्रकार पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी के मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर में अपनी सत्ता जमाई थी। पंजाब में भी बादल परिवार में वंशवाद देखने को मिलता है जिसमें शिरोमणी अकाली दल के संस्थापक और चार बार के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल थे। जिसके बाद इनके परिवार से उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल इस समय पार्टी अध्यक्ष हैं और 2009 से 2017 के बीच राज्य के उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बता दें की सुखबीर एक बार लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं और 1998 में अटल बिहारी वाजपेई की 13 दिनों की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला है वंशवाद

इसी प्रकार पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के परिवार के भी सदस्य राजनीति में हैं. उनकी पत्नी प्रिनीत कौर तीन बार की लोकसभा सांसद हैं और वे यूपीए-2 में मनमोहन सिंह के कैबिनेट में मंत्री भी रह चुके हैं जबकि उनके बेटे रनिंदर सिंह कांग्रेस पार्टी के साथ रहे हैं.अमरिंदर सिंह की मां मोहिंदर कौर भी कांग्रेस की नेता और सांसद रह चुकी हैं, उत्तर प्रदेश मे मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी क्यों ना हो, अखिलेश यादव, मायावती, अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल, लालू यादव, ओमप्रकाश चौटाला, रामविलास पासवान, चंद्रबाबू नायडू, के. चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, शरद पवार, उद्धव ठाकरे.. आदि केवल नाम नहीं, एक पार्टी भी हैं, जो वंशवाद के कारण राजनीति में धाक जमाऐ है। इसी प्रकार भारत देश में करीब 34 परिवाद वाली पार्टीयां अस्तित्व में है। भाजपा में वंशवाद नहीं है ऐसा भी नहीं है। लेकिन भाजपा में वंशवाद निचले स्तर तक ही सीमित है। भाजपा में अध्यक्ष के चुनाव में भी अन्य पार्टीयों की तरह मोह नहीं बल्कि पार्टी के मानको पर ध्यान दिया जाता है। कहीं ना कहीं यहीं कारण है जो आज भाजपा देश में अपना वर्चस्व कायम करने में सफल रहीं है। भारत में बढते वंशवाद के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत की अधिकतर जनता उन उम्मीदवारों को अधिक वोट देना पसंद करती है , जो एक बेहतर राजनीतिक परिवार से अपना ताल्लुक रखते है। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की राजनीति वैज्ञानिक कंचन चंद्रा ने अपनी 2014 की एक रिपोर्ट मे कहा था की भारत में अखबारों मे राजनीतिक घरानों से आने वालें सासंदों की संख्या में जानकर कमी दिखाई गई। जबकि हकीकत तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गठित नए मंत्रिमंडल में राजनीतिक घरानों से ताल्लुक़ रखने वाले मंत्रियों की संख्या 24 प्रतिशत है, जबकि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में यह संख्या 36 प्रतिशत थी।

वंशवाद राजतंत्र का संकेत

भारतीय राजनीति में वंश और परिवार की पकड़ को लेकर कुछ नए आंकड़े देते हुए इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच ने भी 2012 में भारत के बारे में अपनी एक किताब में लिखा हैः की अगर भारत की राजनीति में परिवाद को लेकर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की दशा उन दिनों जैसी हो जाएगी जब यहां राजा महाराजाओं का शासन हुआ करता था। उन्होंने यह भी चिंता जताई थी कि आने वाले दिनों मे लोक सभा ‘राजनीतिक घरानों की संसद’ हो जाएगी। देश के इस उच्च सदन में 545 सांसद सीधे चुने जाऐंगे। भारत भारत में वंशवाद रोतो रात खत्म नहीं होगा सत्य है लेकिन अगर हम कोशिश करें और आज के ज़माने में सोशल मीडिया के ज़रिए बाहरी दुनिया से जुड़े तो यकिनन हम सामंतवाद और परिवारवाद और वंशवाद की राजनीति से छुटकारा पा जाऐंगे। क्योंकि हमने देखा था की दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने में आम आदमी पार्टी ने किस प्रकार सोशल मीडिया का बेहतर ढंग के प्रयोग कर वंशवाद से परे सत्ता हासिल की।

रुचि पाण्डें

मीडिया दरबार

शेयर करें
COVID-19 CASES