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आखिर केंद्र और राज्य सरकार क्यों नही वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित कर पा रही हैं !

आखिर केंद्र और राज्य सरकार क्यों नही वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित कर पा रही हैं !

राज्य सरकार
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आप सभी ने बचपन में एक कहावत खूब सुनी होगी की जितनी चादर हैं उतने ही पैर पसारिये यानी इस कहावत का तात्पर्य यह था की हैसियत के हिसाब से काम करिए लेकिन विडंबना यह हैं की हमारे यशस्वी नेता और निति निर्माताओ ने यह कहावत शायद नही सुनी इसलिए इतना बड़ा बलनडर कर गए और वैक्सीन की उपलब्धता से अधिक लोगो को न्योता दे दिया वैक्सीन लगवाने का और फिर शुरू हो गया अपने वोटरों की लाशो पर आरोप प्रत्यारोप और केंद्र राज्य का खेल, आप अपनी स्क्रीन पर कुछ हेडलाइंस देख रहे होंगे कई राज्यों में वैक्सीन सेंटर वैक्सीन के अभाव में बंद हो चुके हैं और लोग जिंदगी और मौत के बीच में गोते लगा रहे है.

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जब विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीन ड्राइव शुरू हुआ तो हर भारतीय को अपने वैज्ञानिक और सरकार पर गर्व महसूस हुआ और मन में एक उम्मीद जगी की हम जल्द ही इस वैश्विक महामारी से अपने देशवासियों को बचा लेंगे.लेकिन जो वैक्सीन की प्रक्रिया जोर शोर से जनवरी में शुरू की गयी थी उसने मात्र 12 दिनों में ही अपना दम तोड़ दिया और वैक्सीन के अभाव में vaccination सेंटर बंद होने लगे सरकार ने डिमांड और सप्लाई की चैन का कितना ख्याल रखा इसका कोई जिवंत उदहारण हमारे बीच उपलब्ध नही हैं

क्यूंकि कमोबेश देश के हर राज्य में स्थिति समान ही बनी हुई हैं सबका अपना मत हैं और अपनी राय हैं लेकिन जवाबदेही किसकी तय हो किसी को भी नही पता जनता अपने भाग्य को कोसते हुए अपने अपने घरो में बैठी हैं की कभी तो हालात सुधेरेंगे और उनको अपने हिस्से की वैक्सीन मिल पाएगी.

अब सवाल यह हैं की सरकार से चुक कहा हो गयी क्यों नही वैक्सीन की प्रक्रिया के विस्तार के साथ ही वैक्सीन की उपलब्धता को सुनिश्चित किया गया, दरअसल जब सरकार ने वैक्सीन की प्रक्रिया की शुरुआत की तो देश में मात्र दो संस्थान सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया की वैक्सीन कोविदशील्ड और भारत बायोटेक की को-वैक्सीन ही उपलब्ध थी लक्ष्य तय था की शुरुआत में 30 मिलियन फ्रंटलाइन वर्कर को वैक्सीन दी जाएगी जिसका उत्पादन वैक्सीन संस्थान पूरा कर चुकी थी और जब दुसरे और तीसरे फेज की शुरुआत हुई तब वैक्सीन की उपलब्धता कितनी थी इस पर शायद किसी ने विमर्श ही नही किया अगर किया होता तो वैक्सीन सेंटर बंद करने की नौबत नही आती.

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क्या सरकार ने बिना आबादी का गणित बिठाये हुए ही वैक्सीन की प्रक्रिया का विस्तार कर दिया,अगर हम साल 2011 की जनगणना को आधार मानते हुए बात करे तो देश की आबादी फिलहाल में 121.06 करोड़ हैं और उस आबादी के सन्दर्भ में अभी तक देश की कुल आबादी के मात्र 11 प्रतिशत लोगो को ही पहली डोज़ दी जा चुकी हैं और वही कुल आबादी के 3 प्रतिशत लोगो को ही वैक्सीन की दोनों डोज़ मिली हैं.

अगर हम पापुलेशन के सन्दर्भ में बात करे तो 45-60 साल लोगो की कुल आबादी हैं 20.7 करोड़ हैं और अगर बात करे तो 18-45 साल के लोगो की तो आज भारत में उनकी कुल आबादी हैं लगभग 37 करोड़ और अगर 60 साल से ऊपर के आयु वर्ग की बात करे तो उनकी कुल आबादी हैं 13.7 करोड़ हैं लेकिन अगर आबादी की तुलना में वैक्सीन देने के प्रक्रिया की बात करे तो सभी दावे विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के धराशाही होते नज़र आ रहे हैं

अगर हम 45 से 60 साल के आयु वर्ग को वैक्सीन देने की बात करे तो इस वर्ग की कुल जनसँख्या के लगभग 6 करोड़ लोगो को ही वैक्सीन प्राप्त हुई हैं वही 18-45 वायु वर्ग के लगभग 2 करोड़ लोगो को ही वैक्सीन लग पायी हैं.

अब इसमें वैक्सीन के दोनों डोज़ प्राप्त हुई इस आयु वर्ग को या नही इस पर स्थिति अभी साफ़ नही हैं. तो जब सरकार के पास उपलब्धता थी ही नही तो किस दबाव में सरकार ने vaccination के अगले फेज की घोषणा कर दी. क्या सरकार पर कोरोना की दूसरी लहर की अव्यवस्था का इतना दबाव आ चूका था की बिना किसी तैयारी के ही जनता का ध्यान भटकाने के लिए वैक्सीन के अगले फेज का एलान कर दिया और जनता वैक्सीन की लाइनों में लग गयी लेकिन दुर्भाग्य-वश अधिकतर जनता को भी उन कतारों से खाली हाथ ही लौटना पड़ा.

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क्या सरकार के रणनीतिकार अपने Air-CONDITION चैम्बर में बैठ कर जमीनी हकीकत का सही आकलन नही कर पाए इसलिए भी वैक्सीन के डिमांड और सप्लाई में इतना अंतर आ गया और राज्यों को मजबूरन वैक्सीन न उपलब्ध होने के कारण अपने अपने राज्यों के वैक्सीन सेंटर बंद करने पड़े यह जानते हुए की कोरोना का वर्तमान स्ट्रेन सबसे अधिक युवाओ के लिए ही घातक हैं और विडंबना यह हैं की देश के कई राज्य इसी आयु वर्ग को वैक्सीन उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं.

चर्चा की बात यह भी हैं की जिस 35000 करोड़ का प्रावधान वैक्सीन के नाम पर आम बजट में किया गया था उसका क्या हुआ, उस बजट का कितना हिस्सा वैक्सीन की प्रक्रिया में लगाया गया. जब वैक्सीन कम पड़ने लग गयी तो उनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाये गए.

सीरम इंस्टिट्यूट के कार्यकारी निदेशक ने कहा की सरकर ने वैक्सीन के अगले फेज की घोषणा बिना वैक्सीन उत्पादन की पूरी तैयारी किए बिना ही कर दी जिस वजह से वैक्सीन के लिए यह अफरा तफरी मच गयी और जिस वजह से अभी तक किसी भी एक आयु वर्ग का सही से टीकाकरण नहीं किया जा सका हैं.

केंद्र सरकार का कहना है की उन्होंने अभी तक 21.80 करोड़ वैक्सीन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश को दी हैं और अब तक लगभग 19 करोड़ लोगो का टीकाकरण हो चूका हैं यानी बची मात्र 1 करोड़ वैक्सीन हैं और अभी देश की आबादी के लगभग 90 प्रतिशत लोगो को वैक्सीन लगनी बाकि हैं सरकार को आवश्कता हैं की वैक्सीन के फोरमुले को जनहित में अन्य वैक्सीन उत्पादन कंपनी के साथ साँझा करे.

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जिससे वैक्सीन के उत्पादन को बढाया जा सके नही तो इस रफ़्तार से पता ही नही कितने ही दशको में पुरे देश को टिका लग पायेगा सरकार को जरुरत हैं की वैक्सीन के उत्पादन में पारदर्शिता ले कर आये और संक्रमण दर जिस राज्य में अधिक हो उस राज्य में पहले वैक्सीन उपलब्ध कराये और राज्य सरकारो को भी समझने की आवश्यकता हैं की वैक्सीन की बर्बादी न करे और वैक्सीन की उपलब्धता के तर्ज पर उसके अनुरूप अपनी वरीयता तय करे, क्यूंकि केंद्र और राज्य के इस वैक्सीन के झगड़े में आखिरकार नुक्सान आम जनता को ही हो रहा हैं.

जरुरत यह थी की हर राज्य में वैक्सीन उत्पादन केंद्र का गठन होता समय के साथ और वैक्सीन उत्पादन संस्थान और राज्य सरकार आपसी समन्वय स्थापित कर वैक्सीन के उत्पादन को बढ़ा सकती थी केंद्र सरकार वैक्सीन उत्पादन संस्थानों को वितीय सहयोग दे कर वैक्सीन के उत्पादन में बढ़ावा कर सकती हैं. केंद्र सरकार को आवश्यकता हैं की इस महामारी के दौरान टिका वितरण में एकरूपता ले कर आये और राज्यों तक वैक्सीन पहुचाने के लिए तेज़ यातायात साधन उपलब्ध कराये नही तो अभी सिर्फ देश की राजनितिक राजधानी और आर्थिक राजधानी और कुछ अन्य राज्यों में ही कोरोना वैक्सीन का संकट गहराया हैं

लेकिन अगर ऐसे ही हालात रहे तो धीरे धीरे सभी राज्यों के वैक्सीन केंद्र के बाहर वैक्सीन उपलब्ध नही हैं का बोर्ड लग जायेगा और हर साल इस वैश्विक मह्मारी के नीचे दब कर हम भारत के लोग अपने प्रियजनों और अपने प्रिय रोजगार के साधन को खोते रहेंगे और जनता इसी तरह व्यवस्था की बदहाली का शिकार होती रहेगी क्यूंकि भारत में जनता मात्र अब सिर्फ एक वोट बन कर रह चुकी हैं.

 

संपादक – राकेश मोहन सिंह  

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रामजन्म भूमि विवाद पर, ट्रस्ट क्यों बना हुआ है इतना शांत ! “सचिव बैद गुरु तिनी जौ प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तिनी कर होइ बोगिही नास” इन पंक्तियों के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने कहा हैं की लोभ लालच और सच न कहना किसी भी राज्य और कार्य के लिए बहुत ही हानिकारक और नुकसानदायक हो सकता हैं. आज जब लगभग 500 वर्षो के लम्बे आन्दोलन और संघर्ष के बाद रामलला वापस अपने मूल स्थान पर जाने के लिए तैयार थे और भगवान का मंदिर बनने का रास्ता साफ़ हो चूका था और ट्रस्ट भी मंदिर निर्माण का कार्य सौ फीसदी की गति से पूरी इमानदारी से पूरा करने का प्रण लेकर कार्य कर रहा था. तभी फिर से इस राष्ट्रीय आस्था के विषय पर राजनीति शुरू हो गयी आरोप समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक पवन पाण्डेय और आम आदमी पार्टी के उत्तरप्रदेश प्रभारी सांसद संजय सिंह ने कुछ कागज़ दिखाते हुए यह लगाया की करोडो भारतीयों की राम आस्था के साथ भ्रष्टाचार हुआ हैं और जमीन खरीदने में अनियमिता बरती की गयी हैं और नियमो को ताक पर रख दिया गया हैं. शाम होते होते आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव को देखते हुए कांग्रेस भी इस लड़ाई में कूद गयी और सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता में पुरे कथित घोटाले के जांच की मांग कर डाली मामला बढ़ा तो शाम को श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री ने प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा की ट्रस्ट को लेकर और उसकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा भ्रम फैलाया जा रहा हैं जो राजनीति से प्रेरित हैं और जमीन खरीद में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी नही हैं हालंकि उन्हें छोड़ ट्रस्ट से किसी अन्य व्यक्ति का कोई बयान इस मामले पर नही आया 15 बुधिजीवियो का ट्रस्ट लोगो की आस्था के साथ कथित छेड़-छाड़ पर हम स्टडी करेंगे पुरे मामले की, इसके अलावा कुछ नही कह पाया. जो ट्रस्ट पहले हर छोटी बड़ी बात को लेकर प्रेस वार्ता और प्रेस वक्तव्य जारी करता था आज उसने मौन धारण कर रखा हैं और करोडो राम भक्तो के आशंकित मन को राम भरोसे छोड़ रखा हैं,क्या यह ट्रस्ट की जिम्मेदारी नही थी की जो आरोप प्रेस वार्ता कर ट्रस्ट पर लगाये गए है कथित प्रमाणों के साथ उनका जवाब भी ट्रस्ट द्वारा प्रेस वार्ता कर देना चाहिए था अगर सब कुछ ट्रस्ट के संज्ञान में था और पारदर्शी था तो? प्रेस कांफ्रेंस करने में दिक्कत क्या थी ? प्रेस कांफ्रेंस करिए और मामले को खत्म कीजिये जमीन की खरीद का मामला तो ट्रस्ट के सामने था तभी जमीन खरीदी गयी और इकरारनामा और कब्ज़ा पर चम्पत राय महामंत्री के हस्ताक्षर थे, तो यह बात पुरे ट्रस्ट को पता थी फिर ऐसा क्या था जो सबको नही पता था जिस वजह से ट्रस्ट को यह कहना पड़ा की हम स्टडी करेंगे फिर बताएँगे. बताया जा रहा हैं की सदर थाने की इस जमीन का एग्रीमेंट ऑफ़ सेल कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ साल 2011 में कर चुके थे जिस एग्रीमेंट को तीन बार नवीकरण किया जा चूका था 2014 और 2019 में क्यूंकि बताया यह जा रहा था की इस जमीन जिसका गाठा संख्या हैं 243/244 और 246 यह जमीन कानून विवाद के कारण सेल नही हो पाई जिस वजह से जमीन का बस एग्रीमेंट to सेल हुआ था बेनामा अब जा कर हुआ जमीन की कीमत उस समय 2 करोड़ थी और आज के समय इस जमीन की कीमत 4 गुणा तक बढ़ चुकी हैं क्यूंकि जब उच्चतम न्यालय ने 2019 में राम जन्म भूमि पर फैसला सुनाया था उसके बाद अयोध्या में निवेश एकाएक बढ़ गया जिस वजह से जमीन की कीमत 18.50 करोड़ तय की गयी हैं. इन सब बातो को अगर संज्ञान में रखा भी जाए तो यह समझने की आवश्कता हैं की क्या जमीन को लेकर ट्रस्ट की कोई बैठक हुई थी अगर हा तो उसका रिकॉर्ड पब्लिक क्यों नही किया जा रहा हैं, क्या कुसुम पाठक और हरीश पाठक से जमीन मिलने के बाद सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी जमीन को ट्रस्ट को सौपने वाले थे इसका कोई इकरार बहुत पहले ही हो चूका था. सवाल उन गवाहों पर भी उठ रहे हैं जो दोनों जमीनी सौदों में एक हैं जिनमे से एक सज्जन अनिल मिश्र ट्रस्ट के सदस्य हैं और दुसरे अयोध्या फ़ैजाबाद के मेयर श्री ऋषिकेश उपाध्याय क्या वह भी कुसुम पाठक और हरीश पाठक को जानते थे और सुल्तान अंसारी और रवि ओहन तिवारी को भी क्या इस जमीन सौदे की पठकथा 2019 में ही रच दी गयी थी जब इस विवादित जमीन का आखिरी एग्रीमेंट to सेल जो 2019 में हुआ था? आखिर कैसे वक्फ बोर्ड ने इस विवादित जमीन पर से अपना कब्ज़ा छोड़ दिया ? अगर ट्रस्ट को इस जमीन की दरकार थी भव्य राम मंदिर के लिए तो ट्रस्ट के किन लोगो ने कुसुम पाठक, हरीश पाठक, सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी के साथ बैठ कर आपसी समझौता या बातचीत की या कराया जिसके बाद इस कथित विवादित जमीन का इकरार नामा और कब्ज़ा ट्रस्ट के नाम हो गया जिस पर हस्ताक्षर महामंत्री चम्पत राय के थे यह बात जरूर ट्रस्ट को सभी दान धारको को बतानी चाहिए क्यूंकि राम मंदिर कोई निजी निर्माण नहीं हैं यह हैं सार्वजनिक निर्माण और आस्था का विषय इसलिए सभी तरह के विवादों पर ट्रस्ट को अपना पक्ष करोडो राम भक्तो के समक्ष रखना चाहिए. राम मंदिर के विषय पर इस तरह के आरोप लगाना इसलिए भी गंभीर हैं क्यूंकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री की छवि इस पुरे मुद्दे पर जुडी हैं क्यूंकि राम मंदिर का शिलान्यास और भूमि पूजन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था उन्होंने साष्टांग प्रणाम भी किया था और जब भाजपा राम मंदिर को बचाने के लिए रथ लेकर निकली थी तो प्रधानमंत्री उस समय रथ के सारथी भी थे. तो इन आरोपों से कही न कही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि भी धूमिल हो सकती हैं संभवत जिस कारण ट्रस्ट के कथित घोटाले के मामले पर पूरी भाजपा जवाब दे रही हैं लेकिन ट्रस्ट शांत बना हुआ हैं. लेकिन आज ट्रस्ट ने सार्वजनिक चंदे से बन रहे राम मंदिर की जमीन विवाद की गोपनीय रिपोर्ट केंद्र को भेज दी हैं अब वह रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी की नही यह देखने का विषय हैं. ऐसा नही हैं की श्री राम मंदिर निर्माण के नाम पर बने इस मंदिर में सब ठीक चल रहा था जो श्री राम हमेशा से इस बात का अनुसुरण करते रहे की सभी कार्य अपने बड़ो और उनके आशीर्वाद के साथ ही होने चाहिए उन्ही श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए बने ट्रस्ट के चेयरमैन को किसी भी बात का भान नही था की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं ? या ऐसा कोई जमीनी सौदा होने वाला हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दस पिछले एक साल से बीमार चल रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी कमलनयन दास का कहना था की अध्यक्ष को कोई जानकरी नही होती की ट्रस्ट में चल क्या रहा हैं. अब आप खुद समझिए की सार्वजनिक हित के लिए जो ट्रस्ट बना हो उस ट्रस्ट के सदस्यों में ही आपसी संवाद नही हैं तो यह ट्रस्ट जनता के प्रति कितना जवाबदेह होगा इसका फैसला आप कीजिये ? क्या जमीन सौदे के लिए ट्रस्ट ने बिना अध्यक्ष के जमीन खरीद के लिए मीटिंग कर ली क्या ट्रस्ट ने लेश मात्र भी जरुरत नही समझी की अपने ही ट्रस्ट के अध्यक्ष को इस बाबत सूचित किया जाए. ट्रस्ट के पास जनता के दान में दिए हुए 4000 करोड़ रूपए हैं उसकी जिम्मेदारी इस कथित विवाद के बाद ट्रस्ट संभालने में सक्षम हैं और कितने सौदे और पैसो का लेन देन बिना अध्यक्ष की जानकारी के हुई हैं ? क्या ट्रस्ट को कोई ऐसी व्यवस्था नही करनी चाहिए की भारत देश का नागरिक चलिए हिन्दू नागरिक कर लेते हैं जो जब चाहे यह जान सके की ट्रस्ट कहा-कहा पैसे खर्च कर रही हैं. मामला राजनितिक छिटा-कशी से कही अधिक करोडो लोगो की आस्था का हैं भले ही यह आरोप राजनीति से प्रेरित हो लेकिन आरोप तो लगे हैं और अगर इस पर समय रहते ट्रस्ट की तरफ से सफाई न दी गयी तो लोगो का विश्वाश कमजोर हो सकता हैं ट्रस्ट पर भले वह एक ही व्यक्ति क्यों न हो जो की राम के सिदान्तो के बिलकुल प्रतिकूल होगा, क्यूंकि राम राज्य में सत्य का प्रसार और धर्म का विस्तार होता हैं. जो राजनितिक पार्टिया इसको सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की मांग कर रही हैं उन्हें इस से भी बचना चाहिए क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो पाया था उसे फिर से कोर्ट की दहलीज पर नही ले जाना चाहिए क्यूंकि मंदिर निर्माण करोडो लोगो की आस्था और संघर्ष का विषय है यह हमें नही भूलना चाहिए की भारत वर्ष ने इस आन्दोलन के कारण कितने ही बलिदान और सामाजिक उन्माद का गवाह बन चूका हैं. राजनितिक पार्टी हो सकता हैं इस कथित घोटाले के नाव पर सवार हो कर 2022 का चुनावी सागर पार कर लेना चाहती हो और भाजपा को हिन्दुत्व विरोधी बताकर 2022 का चुनावी समर अपना अपने नाम कर लेना चाहती हो लेकिन उन्हें यह समझना होगा की मुद्दे को कोर्ट में घसीट कर वह कही फिर अपने आप को हिन्दुत्व विरोधी न बना ले. अगर यह विषय 2022 तक जीवित रहा तो चुनावी नुक्सान तो जरुर होगा लेकिन किसका यह अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं. छवि तो संघ और विशव हिन्दू परिषद की भी ताख पर हैं क्यूंकि इस आन्दोलन में यह दोनों संगठन मुखर थे अब देखना हैं की भविष्य में ट्रस्ट की स्टडी इस पर कब खत्म होती हैं और वह कब इस पर सही तरीके से जनता के आशंकित मन से इस कथित घोटाले के आशंका को ख़त्म करेगा क्यूंकि इस पुरे मसले पर सिर्फ भाजपा मुखर हैं लेकिन उसके अपने कुछ राजनितिक हित और अपने हिन्दुत्व पक्ष की छवि बचान्रे की चुनौती हो क्यूंकि इस पुरे राम मंदिर निर्माण का सबसे अधिक राजनितिक फायदा किसी को हुआ था तो वह भाजपा ही थी तो भाजपा अपने इस नफे को राजनितिक नुक्सान में कतई परिवर्तित नही होना देना चाहेगी जिस वजह से पार्टी मुखर हैं लेकिन ट्रस्ट पर दबाव हैं करोडो राम भक्तो की ट्रस्ट पर विश्वसनीयता बनाये रखने की जो की अति आवश्यक हैं इसलिए ट्रस्ट को बिना हिलाहवाली के जनता के सवालों का जवाब सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए, जरुरत इस बात की भी हैं की इस जमीन सौदे के सभी पक्ष मीडिया के सामने आये एग्रीमेंट to सेल और सेल dead की कॉपी लेकर तभी अब इस कर्थित घोटाले पर राजनितिक गर्मी शांत होगी क्यूंकि राम राजनीति का नही आस्था का विषय हैं.

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