राष्ट्रीय राजनीति विचार

संसद हंगामे के बीच कमजोर होती देश की संघीय व्यवस्था !

संसद हंगामे के बीच कमजोर होती देश की संघीय व्यवस्था !

                    संसद हंगामे के बीच कमजोर होती देश की संघीय व्यवस्था !

संसद भारत संघ की सर्वोच्च विधायिका का नाम हैं संसद ओर उस संसद में बैठे सभी सदस्यों का यह नैतिक कर्तव्य हैं की उस संसद से ऐसे कानून पारित हो जिसका सीधा सरोकार आम जन से हो। संसद को चलाने की एक सूचीबद्ध  प्रक्रिया हैं, जिसके तहत संसद में कार्यो का क्रियान्वन सुनिश्चित किया जाता हैं। लेकिन कल संसद की कार्यवाही के दौरान फिर संसद अपने ही मानीनीय सदस्यों द्वारा शर्मिंदा कर दी गयी।

कल राज्यसभा में अश्विनी वैष्णव पेगासस जासूसी काण्ड पर संसद के पटल अपना बयान रख रहे थे तभी तृणमूल के सांसद शांतनु सेन ने मंत्री अश्विनी वैष्णव से जवाब की कॉपी ली और उसको फाड़ कर उपसभापति की तरफ फेक दी और संसदीय परम्परा का चीरहरण कर दिया। इस पर अश्विनी वैष्णव ने कहा की तृणमूल संसद के भीतर हिंसा की नयी परम्परा को जनम दे रही हैं ओर यह इनकी मानसिकता को प्रदर्शित करती हैं।

कल जिस असंसदीय कृत्य को सदन में अंजाम दिया गया उस पर कार्यवाही करते हुए तृणमूल सांसद शांतनु सेन को इस मानसून सत्र के लिए सदन की कार्यवाही से निलंबित कर दिया गया हैं। उच्च सदन के सभापति वेंकैया नायडू ने कहा की इस तरह पेपर को फाड़ कर पीठ की तरफ उछालना लोकतंत्र पर हमला हैं। संसद में विपक्ष सरकार की जवाबदेही तय करता हैं उन मसलो पर जिनसे देश की जनता से सीधा सरोकार हैं और वह मुद्दे आम जनता को सीधा प्रभावित करते हैं।

संसद ने जितने भी प्रतिनिधि हैं उन पर यह जिम्मेवारी हैं की वह जनता के हित को संसद के माध्यम से साधे इसलिए देश की जनता ने उनको सामाजिक अनुबंध के तहत उन पर यह जिम्मा सौपा की आप संसद के माध्यम से उनका सामाजिक उत्थान करे लेकिन क्या ऐसा हो रहा हैं आज के परिपेक्ष में यह सोचने की आवश्यकता हैं ? क्या राजनितिक दल संसद के भीतर उन विषयों को उठा रहे हैं, जिसका सीधा सरोकार जनता से हैं इस बार विपक्ष के पास कितने ही विषय हैं जिस पर वह संसद के भीतर सरकार की जवाबदेही तय कर सकती हैं।

महंगाई,बेरोजगारी, किसान आन्दोलन, बाढ़ की समस्या से जूझते लोगो की परेशानी, देश में बेहतर स्वास्थ आधारभूत संरंचना कैसे तैयार की जाए ओर इस महामारी के दौर में रोजगार के अवसर सृजत कैसे किया जाए इन विषयों पर बहस करने की बजाय संसद के भीतर उन विषयों पर हंगामा हो रहा हैं जिसके प्रमाणिकता के कोई साक्ष्य किसी भी राजनितिक दल के पास उपलब्ध नहीं हैं।

एक विदेशी गैर लाभकारी मीडिया संस्थान फॉरबिडन स्टोरीज और एम्निस्टी इंटरनेशनल द्वारा एक्सेस एक रिपोर्ट पर देश के संसद सदस्य जिनकी जवाबदेही इस देश के जनता के प्रति हैं वह एक विदेशी संस्था द्वारा अलग अलग मीडिया संस्थानों को बाटी गयी रिपोर्ट को आधार बना कर संसद सदस्यों द्वारा अपनी जवाबदेही से बचने का एक निरंकुश प्रयास किया जा रहा हैं।

इसके स्थान पर बेहतर होता की संसद में कार्य संसद नियमवाली के आधार पर होते देश की समस्याओ पर प्रशन होता और सरकार की जवाबदेही तय की जाती लेकिन उसके जगह हो यह रहा हैं की संसद परिसर में गाँधी प्रतिमा के नीचे धरना हो रहा हैं कोई संसद गेट पर खड़ा हो कर धरना दे रहा हैं मानो की संसद में बेस्ट धरना प्रतियोगिता शुरू हो गयी हो और 13 अगस्त को उसके परिणाम घोषित होने हैं और फिर प्रतियोगिता जीत सभी अपने चांदनी महल में जा कर खुशिया मनाएंगे।

भारत में एक संघीय व्यवस्था हैं और उसी संघीय व्यवस्था के तहत देश की संसद तय नियमावली के तर्ज पर कार्य करती हैं। संघ में संसद सर्वोच्च हैं ओर उसकी गरिमा सबसे सर्वोच्च हैं अगर संसद की गरिमा को ठेस पहुचता हैं तो वह सीधा सीधा देश की संघीय व्यवस्था को ठेस पहुचना हैं।

यह पहला अवसर नहीं हैं तृणमूल के सांसदों ने देश की संसदीय परंपरा का चीरहरण किया हो इस से फले भी कृषि कानून बिल के समय भी तृणमूल के सांसदों ने कृषि कानून बिल की कॉपी को फाड़ कर राज्यसभा में आसन की तरफ उड़ाया गया था और इस बार एक कदम और आगे जाते हुए कैबिनेट मंत्री के हाथ से जवाब की कॉपी छीन कर आसन की तरफ उड़ा दिया गया यह हम किस तरह का संघीय ढाचे का निर्माण कर रहे हैं ?

क्या संसद न चलने देना और संसद सत्र के बीच हंगामा खड़ा कर देना विपक्ष और पक्ष को जनता के प्रति कम जवाबदेह नहीं बनाता हैं ? क्या हंगामा करने से संसद से जनता के हित को साधा जा सकता हैं? डॉ आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था की भारत अब एक संघ हैं जो संविधान के अनुरूप चलेगा और और संविधान कितना बेहतर हैं इसको सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी इसे चलाने वालो पर होगी तो कही न कही हमारे राजनितिक पार्टी के संसद सदस्य कही न कही इस तरह संसद की कार्यवाही के दौरान हंगामा कर देश के संविधान देश की संघीय व्यवस्था और लोकतंत्र पर जनता के विश्वास को कमजोर नहीं कर आ रहे हैं।

संसद से देश की जनता यह उम्मीद करता हैं की संसद उनको सामजिक आर्थिक और राजनितिक समानता दिलाने के लिए निरंतर प्रयास रहेगा लेकिन जनता के पैसे से चलने वाली संसद अगर जनप्रतिनिधि के  हंगामे की वजह से स्थगित हो जाती हैं तो जनता का लगभग प्रतिदिन का 6 करोड़ रूपए बर्बाद हो जाते हैं। संसद निचले सदन यानी लोकसभा में 6 घंटे और उच्च सदन राज्यसभा में एक दिन में लगभग 5 घंटे का काम होता हैं और जिस दिन काम नहीं होता सोचिये की देश की जनता और देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से कितना नुकसान होता होगा।

देश के संसद के भीतर इस तरह की घटना कही न कही हमारे देश की संघीय व्यवस्था को आक्रामक संघवाद की तरफ धकेल रहे हैं ओर होना यह चाहिए की मजबूत और स्वस्थ्य संघवाद की परिकल्पना के लिए प्रतिस्पर्धा अति आवश्यक हैं नहीं तो आक्रामक संघवाद से देश का संघीय ढाचा कमजोर होगा और आक्रामकता के स्थान पर देश की संसद में संवाद को स्थापित करने की आवश्यकता हैं नहीं तो देश के लोकतान्त्रिक मंदिर से देश की जनता का विश्वास कमजोर होगा जो देश के संघीय ढाचे के लिए अनुकूल परिस्थिति नहीं हैं।

 

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रिपोर्ट : संपादक राकेश मोहन सिंह

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