राष्ट्रीय

सचिन पायलट की घर वापसी

“मैं हमेशा ही कांग्रेस का हिस्सा था, और यह कोई कमबैक नहीं है।मै और मेरे समर्थक विधायकों ने सैधांतिक मुद्दे उठाये और वे बहुत जरुरी थे”, बीती रात, इन्ही कुछ शब्दों के साथ राजस्थान सरकार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कांग्रेस पार्टी में ही बने रहने का एलान कर दिया है। लगभग एक महीने पहले ही 30 कांग्रेस विधायकों की मंडी लगाने वाले सचिन पायलट ने एलान किया था कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार अल्पमत में है। लगभग तीस दिनों के दौरान ऐसे कौन से घटनाक्रम रहे होंगे, जिसके कारण पायलट के बागी सुर अचानक से बदल गए। इसी बीच अशोक गहलोत का सचिन पायलट को नकारा और निक्कमा करार देना और अशोक गहलोत के बेटे और विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के बीच बातचीत का वो विडियो वायरल होना, जिसमे सीपी जोशी को ये कहते हुए पाया गया कि अगर पायलट ख़ेमे के 30 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की तो गड़बड़ हो जायेगी, हालात थोड़े मुश्किल है। इन वाकयो ने ढींढोरा लगभगपीट ही दिया कि राजस्थानसरकार अल्पमत में और सरकार का जाना तय है।तो फिर ऐसे कौन से हालत रहे होंगे कि पायलट को घर वापसी करनी पड़ी और यह कहना पड़ा मेरी लड़ाई बस विचारों की ही लड़ाई थी। बस विचारों की ही लड़ाई में सरकार गिराने की धमकी दे देना कहाँ तक जायज़ है? और अगर विचारों की लड़ाई की ही लड़ाई थी तो कांग्रेस मध्य प्रदेश में सरकार बचाने में असफल क्यों रही?

इस बात को समझने के लिए हमे थोडा पीछे की ओर चलना होगा, याद कीजिये जब सचिन पायलट ने अशोक गहलोत की सरकार को अल्पमत में कहकर तहलका मचा दिया था, उसी दौरान राजस्थान के नागौर से आने वाले पूर्व भाजपा विधायक और मौजूदा रालोपा यानी राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक पार्टी के लोकसभा सांसद हनुमान बेनीवाल ने ट्वीट कर यह बताया था राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने हरेक कांग्रेस के विधायको को फ़ोन कर अशोक गहलोत सरकार का समर्थन करने को कहा और साथ ही सचिन पायलट से दूर रहने की सलाह दी है। बेनीवाल यही नहीं रुके उन्होंने ये तक कहा कि राजे पुरजोर कोशिश कर रही है की अशोक गहलोत सरकार बनी रहे और इस बात के उनके पास पुख्ता सबूत भी है। तो क्या सच में भाजपा की नेता वसुंधरा राजे ने कांग्रेस की सरकार बचाने का प्रयास किया? इसके पीछे कितनी सच्चाई है ये तो अभी कह पाना मुश्किल होगा। लेकिन मौजूदा हालात में सचिन पायलट के पास ना तो विधायको की संख्या बची थी और ना ही भाजपा में उन्हें अपना भविष्य नजर आ रहा था। पायलट के पास 30 में से 19 विधायक ही बचे थे। उधर बसपा के 6 विधायक कांग्रेस में जुड़ चुके थे जिसकी सुनवाई 17 अगस्त से पहले संभव लग नहीं रही थी। ऐसे इस बात की पूरी संभावना थी कि अशोक गहलोत 14 तारीख को ही सदन में बहुमत साबित कर देते और साथ ही उनके ख़ेमे के विधायको को विश्वास मत के लिए दिल्ली से जयपुर लाना पड़ता, और अशोक गहलोत तो जादूगर है वो तो उन विधायकों को मना ही लेते और इससे सचिन पायलट अलग थलग पड़ जाते।उधर अगर अशोक गहलोत सरकार गिर भी जाती तो मध्य प्रदेश की तर्ज पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को ही बनाया जाता और पायलट को एक बार फिर से उपमुख्यमंत्री पद के साथ ही संतोष करना पड़ जाता। इस तरह के हालात में पायलट के पास ज्यादा अवसर बचे ही नहीं थे और बिना पार्टी के केवल विधायक बने रहने उनके राजनैतिक करियर को काफी नुकसान पहुच सकता था। शायद यही कारण रहे कि सचिन पायलट को राहुल गाँधी से बात कर के कांग्रेस में वापस अपने लिए जगह बनानी पड गयी। बीच में ये भी दौर आया था, भाजपा अपने विधायकों को गुजरात लेकर चली गयी थी। शायद उन्हें उम्मीद थी कि अशोक गहलोत सरकार को बचाने के लिए उनके विधायकों से संपर्क साधे या वसुंधरा राजे के इशारे पर विधानसभा में क्रॉस वोटिंग कर सरकार गिरने से बचा दे। इन सब के बीच सियासी बाज़ार में ये अटकले लगाई जा रही है कि वसुंधरा राजे भाजपा छोड़ कांग्रेस में आ सकती है लेकिन वो तो समय बतायेगा। फिलहाल कांग्रेस चैन की सांस ले सकती है कि यहाँ तो उनकी सरकार बच गयी है। भाजपा को भी चिंतन करना होगा क्यूंकि उनके साथ ऐसा 8 महीने पहले ही महाराष्ट्र में हो चुका है। वहां तो अजीत पवार की मदद से फडनविस तो मुख्यमंत्री भी बन चुके थे। ऐसी घटनाओं से पार्टी की राजनैतिक छवि पर भी असर पड़ता है।

 

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