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सीवर साफ़ करने वाले सरकारी आकड़ो का हिस्सा नही !

सीवर साफ़ करने वाले सरकारी आकड़ो का हिस्सा नही !

सीवर साफ़
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आज दुनिया इक्सवी सदी के तीसरे दशक में हैं और आज सोचिये भारत इस बात पर चर्चा कर रहा हैं की भारत में हाथ से मैला ढोने वाले लोगो की मृत्यु इस देश में हुई हैं कि नहीं,यह भारत का दुर्भाग्य ही हैं की देश की आजादी के 75 साल बाद भी हम औपनिवेशवाद की परिस्थितयो से बाहर नही निकल पाए हैं। सीवर साफ़

28 जुलाई को संसद में सामाजिक न्याय मंत्री राम दास अठावले ने बताया की देश में बीते पाच साल में मैन्युअल स्केवाजिंग से मृत्यु का एक भी मामला संज्ञान में नहीं आया हैं। सामाजिक न्याय मंत्री से यह सवाल राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और एल हनुमंतैया ने पूछा था। सीवर साफ़

लेकिन हास्यास्पद यह हैं की इसी साल एक लिखित जवाब में बजट सत्र के दौरान सामाजिक न्याय मंत्री रामदस अठावले ने लोकसभा में कहा था की बीते पांच साल में सेप्टिक टैंक और सीवर साफ़ करने के दौरान 340 लोगो की मृत्यु हुई हैं।

लेकिन मानसून सत्र आते आते सभी लोग शायद फिर जीवित हो गए इस वजह से सरकार ने अपने मृत्यु हिसाब को ठीक करते हुए बताया की बीते पांच साल में मैन्युअल स्क्वेजिंग से एक भी मृत्यु नही हुई हैं जैसे कोरोना काल के दौरान ऑक्सीजन की कमी से एक भी मृत्यु नही हुई हैं। सीवर साफ़

मैन्युअल स्क्वेजिंग होता क्या हैं 

सीवर साफ़

2013 में मैन्युअल स्क्वेजिंग की परिभाषा तय की गयी और कानून (मैन्युअल स्क्वेजिंग नियोजन प्रतिषेध और पुर्नवास अधिनियम) लाया गया था। इस परिभाषा के तहत “ ऐसा व्यक्ति जिससे स्थानीय प्राधिकारी हाथो से मैला  ढुलवाये, साफ़ कराये ,ऐसी खुली नालिया या गड्ढे जिसमे किसी भी तरह से इंसानों का मल-मूत्र एकत्रित होता हो उसे कोई भी इंसान हाथो से साफ़ करेगा तो वह मैन्युअल स्क्वेजर कहलायेगा।

इसका अभिप्राय यह हैं की किसी भी स्थान या कोई भी प्राधिकारी किसी भी व्यक्ति से हाथ से मैला नही उठवा सकता नाहि उसको ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकता हैं इसका मतलब यह हुआ की 2013 के बाद इस तरह की घटनाओ पर विराम लगा होगा लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ हैं।

इसके उलट भारत सरकार की ही एक संस्था हैं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग उसकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 से लेकर वर्ष 2020 तक 631 लोगो की मौत सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करते हुए हुई हैं। लेकिन एक बात समझ नही आ रही हैं की सच कौन बोल रहा हैं सरकार या सरकारी संस्था क्यूंकि एक का कहना हैं की मौत हुई सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ करने से और मंत्री महोदय कहते हैं देश के लोकतान्त्रिक मंदिर में खड़े हो कर की मृत्यु नहीं हुई है।

आखिर क्यों कहा सरकार ने की मैन्युअल स्क्वेजिंग से एक भी मौत नहीं हुई हैं

सरकार मैन्युअल स्कवेजिंग शब्द का तकनीकी उपयोग करते हुए सरकार ने बड़ी ही होशियारी से कहा की मैन्युअल स्क्वेजिंग के दौरान नही इन सफाई कर्मचारियों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ करते हुए हुई हैं न की मैन्युअल स्क्वेजिंग के दौरान अब आप सोचिये की सीवर और सेप्टिक टैंक में क्या एकत्र होता हैं।

अब आप सब समझदार हैं की कैसे इस देश में आम इंसान की जान को शब्दों से हेर-फेर कर छुपा लिया जाता हैं। इसमें गलती सरकारों की भी नही हैं क्यूंकि भारत में एक आम आदमी के जीवन की अहमियत राजनितिक पार्टी को हर 5 साल में एक बार ध्यान आती हैं जब चुनाव होते हैं क्यूंकि आम आदमी तो सरकार के लिए मात्र एक संवैधानिक वोट हैं।

जब तक वोट का दिन नही आ जाता तब तक आपका ख्याल हैं उसके बाद सवारी अपने समान की खुद जिम्मेवार हैं। यह हैं की मैला ढोना भी भारत में एक रोजगार हैं वो भी गैरकानूनी लेकिन रोजगार तो दे ही रहा हैं और यह इंसानी जिंदगियो के साथ बेरोजगारी दर घटाने में भी सरकार को सहयोग तो प्रदान कर ही रहा हैं। सीवर साफ़

वैसे भी देश में लगभग आज के समय में 40 हज़ार से 50 हज़ार चिन्हित व्यक्ति ऐसे हैं जो हाथ से मैला ढोते हैं। यह देश 1955 से ही इस दिशा में कार्यरत हैं की इस देश से मैला ढोने की समस्या खत्म हो जाए लेकिन आज भी समस्या जस की तस बनी हुई हैं।

आखिर क्यों नही देश में से मैला ढोने की समस्या खत्म हो रही हैं?

सके पीछे कई सारे सामजिक आर्थिक राजनितिक और सांकृतिक कारण हैं। समाज का कोई भी व्यक्ति हो वह एक ख़ास संस्कृति में पैदा होता हैं और उसी संस्कृति में बड़ा भी होता हैं और इस कालांतर वह कई पूर्वाग्रहों से भी ग्रसित होता हैं फिर चाहे वह उच्च जाति का बालक हो या दलित जाति का उसे समझाया जाता हैं

की उसके अधिकार क्या हैं और उसके कायदे क्या हैं कही कही इसका अपवाद देखने को मिल जाता हैं लेकिन आज भी सुदूर गाँव की हकीकत इससे इतर नही हैं अगर कोई व्यक्ति उन सब काल कोठारी से निकल कर आगे की राह चुनता हैं तो उसको यह एहसास दिला दिया जाता हैं की अपना इतिहास मत भूलो और अपने कायदे में रहो और यही तुम्हारा अमिट सत्य हैं । सीवर साफ़

कई लोग इस मैला ढोने की प्रथा को छोड़ते भी हैं लेकिन समाज उन्हें दिल से अपना ही नहीं पाता जिस कारण उन्हें वापस से इस कार्य में अपने परिवार के भरण पोषण की खातिर जाना ही पड़ता है। इस प्रथा को सामाजिक रूप से खत्म करने के लिए समाज को अपनाने के साथ अपने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को भी त्यागना पड़ेगा।

मैला ढोने वाले श्रमिको के पुर्नवास के लिए सरकार ने आर्थिक मदद का प्रावधान किया हैं लेकिन उस सहायता राशि का मूल्य मात्र 40,000 रूपए हैं और आप खुद सोचिये की इस राशि से कोई कैसे अपने परिवार के भरण पोषण के लिए स्वरोजगार शुरू कर सकता हैं इसलिए श्रमिक सालो साल इस कार्य में लगे रहते हैं और यही किसी सीवर और सेप्टिक टैंक में अपना देह त्याग आते हैं और आपका चलाया गया सुबह का फ्लश का पानी वैसे ही किसी सेप्टिक टैंक में जा कर गिरता हैं।

इन श्रमिको के जीवन बेहतरी के इसलिए भी कार्य नही हो रहा हैं की यह समाज या श्रमिक सरकार और राजनितिक पार्टियों के निति और राजनितिक परिदृश्य में हैं ही नही इसलिए समाज का यह वर्ग हाशिये पर खड़ा हैं। सीवर साफ़

राजनितिक पार्टियों और सरकारों को पता हैं की यह वर्ग अधिक शिक्षित और सचेत तो हैं नही तो कैसे भी बरगला कर इनका वोट हासिल कर लेना हैं और फिर 5 साल बाद की बात रहेगी तब फिर और कुछ उपाय देखा जायेगा और जिस देश की राजनीति आजादी के 75 साल भी जाति पर ही आधारित हो उस देश में आप कैसे यह उम्मीद लगा सकते हैं की किसी विशेष जाती का दर्द और उसकी बदहाली को कम किया जाएगा क्यूंकि उसकी जाती और बदहाली का डर दिखा कर ही तो उनका संवैधानिक हक़ पर डाका डाल दिया जाता हैं। सीवर साफ़

इस श्रमिक वर्ग और संविधान को इस बदहाली और डर का एतराम भी करना चाहिए की जिस वजह से लोकतंत्र में दलित की प्रसिंगकता बनी हुई हैं और उसके नाम की राजनीति करने वाले अपने अपने चांदनी महल में बैठ कर रूम फ्रेशनर की सुंगध में बैठ कर उन्हें दुर्गन्ध भरी जिन्दगी से आजाद कराने के लिए रणनिति बना रहे होते हैं, खैर इस देश की विंडबना भी यह हैं की गरीब की राजनीति करने वाला सदैव अमीर बन जाता हैं। सीवर साफ़

लगभग देश भर में निगम और दुसरे प्राधिकरण मैला ढोने का काम आउटसोर्स करते हैं और आउटसोर्स करने वाले अधिक से अधिक आर्थिक लाभ कमाने के लिए आधुनिक मशीनों का प्रयोग नही करते और श्रमिको को हाथ से ही मैला,सीवर और सेप्टिक टैंक साफ़ करने के लिए मजबूर करते हैं।

बिना सुरक्षा उपकरण मजदूर की मौत होती हैं लेकिन उस सुरक्षा उपकरण को न खरीदने से जो पैसा बचता हैं और जो शायद सबमे बटता हैं जिस वजह से सब अधिकारी और नेता शांत रहते हैं उन मौत पर जो सीवर और सेप्टिक टैंक की जहरीली गैसों के कारण होती है। सीवर साफ़

कोई भी विभाग इन मृत्यु पर किसी की जवाबदेही तय नहीं करता और जो मुआवजा राशि 10 लाख रूपए इन श्रमिको के लिए कोर्ट आदेश के बाद तय की गयी थी वह भी इन अभागो को समय पर नही मिलती हैं क्यूंकि यह किसी के फ्रेमवर्क में हैं ही नही और ना ही सत्ता को इनकी फ़िक्र हैं । सीवर साफ़

आगे की राह क्या हैं ?

समाज को इस बात को तय करने की आवश्यकता हैं की इस तरह के कार्य किसी की मानवीय गरिमा को ठेस पहुचाते हैं और वह श्रमिक भी हमारे समाज का ही हिस्सा हैं और उसका भी पूरा संवेधानिक हक़ हैं गरिमामय जिंदगी जीने का । सीवर साफ़

अगर कोई व्यक्ति मैला ढोने की प्रथा छोड़ अपनी नयी जिन्दगी फिर से शुरू करना चाहता हैं तो एक समाज के रूप में हमारा फ़र्ज़ हैं की हम उसे खुले मन से सामाजिक और आर्थिक अवसर प्रदान करे। सरकारों को स्थानीय स्तर पर प्रशासन की जिम्मेवारी तय करनी होगी की इन मौत के असल कारण और उन अवरोध तक पंहुचा जाए जिस वजह से यह प्रथा खत्म नही हो पा रही जब देश अमृत महोत्सव और देश की आजादी की 75 वी वर्षगाठ के मुहाने पर खड़ा हैं। सीवर साफ़

सरकार तकनिकी फेरबदल कर अपनी जवाबदेही से भाग नही सकती हैं और यह तरीका बिलकुल भी जनतांत्रिक मूल्यों के लिए ठीक नही हैं यह कह कर की हमारे पास सम्बंधित विषय का कोई रिकॉर्ड ही उपलब्ध नही हैं । क्यूंकि एक लोकहितकारी राज्य की यह प्रतिबधता हैं की वह अपने राज्य के सभी व्यक्ति को एक गरिमामय जीवन उपलब्ध कराये। सीवर साफ़

राजनितिक पार्टियों को भी इस श्रमिक वर्ग को अपने राजनितिक बिंदु में रखना होगा की जब वह सरकार में आये तो इनके उत्थान के लिए व्यापक रणनीति बना सके। हमारे निति नियंताओ को यह समझने की जरूरत हैं की इनके लिए निति का निर्माण इनकी जमीनी हकीकत से रूबरू होने के बाद ही बने नही तो यह वर्ग हवा में बनी नीतियों के कारण हमेशा हाशिये पर ही रहेगा। सीवर साफ़

एक लोकतान्त्रिक देश की सबसे बड़ी चुनौती यही हैं की उस देश के संविधान के तहत सबको सामजिक आर्थिक और राजनितिक समानता मिले अगर ऐसा नही होता हैं तो उस देश की सभी लोक कल्याणकारी नीतिया सिर्फ छलावा सी मालुम होगी ।    सीवर साफ़

संपादक-राकेश मोहन सिंह 

 

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