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हंगामे की भेट चढ़ती देश की संसदीय व्यवस्था !

हंगामे की भेट चढ़ती देश की संसदीय व्यवस्था !

संसदीय व्यवस्था
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भारत की संसद,भारत देश की विधानपालिका का सर्वोच्च निकाय ओर इसकी कार्यशैली पर सवाल उठाये हैं। देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च कर्ता यानि देश के मुख्य न्यायधीश ने सवाल उठाये हैं। प्रधान न्यायधीश एन.वी रमणा ने रविवार को कहा कि देश में कानून बनाने की प्रक्रिया खेदजनक स्थिति में हैं। संसदीय व्यवस्था

प्रधान न्यायधीश ने कहा कि संसद में बहस न होने के कारण कानूनों के कई पहलू अस्पष्ट रह जाते हैं। जब अदालते बहस के बाद फैसला सुनाती हैं तो हम सभी को विधायिका की मंशा के बारे में स्पष्ट रूप से पता होता हैं।संसदीय व्यवस्था

लेकिन संसद में बिना बहस जब बिल पास होते हैं ओर कानूनों को जब अदालत में चुनौती दी जाती हैं। तब हमारे सामने यह स्थिति स्पष्ट नहीं होती की कानून पारित करते वक्त विधायिका की मंशा क्या थी। जब विधायिका की मंशा कानून पारित करते वक्त स्पष्ट होती हैं तो अदालतों में उन कानूनों को चुनौती देने वालो कि संख्या कम हो जाती हैं।

प्रधान न्यायधीश ने कहा की पहले सदन में जाने वाले अधिकतर सदस्य कानूनी पृष्ठभूमि के होते थे,जिस वजह से सदन के समक्ष पारित करने के लिए रखे कानूनों पर जोरदार बहस होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं होता इसलिए यह हमारी भी जिम्मेदारी हैं कि हम लोग सार्वजनिक जीवन में अपनी रूचि दिखाए।

प्रधान न्यायधीश ने यह वक्तव्य संसद के इस मानसून सत्र के हंगामे में बहजाने की पृष्ठभूमि में दिया था। प्रधान न्यायधीश 75वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। प्रधान न्यायधीश ने मुख्य रूप से संसद में कम होती बहस अधिक पास होते क़ानूनी बिल पर अपनी चिंता व्यक्त कि हैं।संसदीय व्यवस्था

कितना कामकाज हुआ 17वीं लोकसभा के मानसून सत्र में

संसद का यह मानसून सत्र जुलाई 19 से अगस्त 13 2021 के लिए तय था, लेकिन हंगामे के बीच ही सदन को 2 दिन पूर्व ही यानि 11 अगस्त 2021 को अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित कर दिया गया. इस मानसून सत्र में लोकसभा में तय निर्धारित समय का मात्र 21 प्रतिशत काम हुआ.

लोकसभा में इस मानसून सत्र की 19 बैठको के लिए 114 घंटे और राज्यसभा की 19 बैठको के लिए 112 घंटे निर्धारित थे.लेकिन राज्यसभा में स्थिति भी लोकसभा तुल्य ही बनी रही ओर उपरी सदन में भी कुल निर्धारित समय का मात्र 29 प्रतिशत ही काम सदन में अपना मूल स्वरुप ले पाया ओर संसद के दोनों ही सदनों में 19 बैठको में मात्र 17 बैठके ही अपना मूल स्वरुप ले पायी बाकी अधिकतर समय सदन अपने सम्मानित सदस्यों से अपनी मर्यादा के लिए किसी भिक्षु के समान उनकी ओर देखती रही.संसदीय व्यवस्था

लोकसभा 2016 के शीतकालीन सत्र के बाद सबसे कम चली 2016 शीतकालीन सत्र में लोकसभा में मात्र अपने तय समय का मात्र 15 फिसद ही काम हो पाया था ओर दूसरी ओर राज्यसभा ने भी अपना 10 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ते हुए इस सत्र में सबसे कम काम करने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया.

17वीं लोकसभा में 18 बिल पास किये गए ओर उन तमाम बिल पर औसतन मात्र 34 मिनट ही चर्चा की गयी ओर कुछ महत्वपूर्ण बिल जैसे की लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप(ammendement) बिल तो मात्र 5 के अंतराल में ही सदन में पास कर दिए।संसदीय व्यवस्था

वही दूसरी और संसद के उपरी सदन(राज्यसभा)में भी चर्चा की स्थिति कमोबेश समान ही बनी रही यहाँ भी प्रत्येक बिल पर औसतन 46 मिनट की ही चर्चा संपन्न हो पायी। एक बिल मात्र 127वे संविधान संशोधन बिल (ओबीसी आरक्षण बिल) पर ही लोकसभा में 474 मिनट और राज्यसभा मे 360 मिनट की चर्चा हुई और यह इस मानसून सत्र में यही अकेला बिल ऐसा था जिस पर संसद एक मत दिखी क्यूंकि इसमें सभी राजनितिक पार्टियों का सामूहिक हित छुपा था।

कई राजनितिक पार्टिया इसका काफी लम्बे समय से इंतज़ार भी कर रही थी इसलिए स्वयं के राजनितिक हित को साधने की आकांक्षा में भले एक दिन ही सही लेकिन सदन मर्यादित रूप से चली। बाकि समय तो इस पुरे सत्र के दौरान संसद मानो किसी अनाथ बच्चे की तरह अपने आप को उपेक्षित ही महसूस करती रही।संसदीय व्यवस्था

17वी लोकसभा में मात्र 12 प्रतिशत बिल को ही पार्लियामेंट कमेटी के पास भेजा गया जो 2014 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। 14वी लोकसभा में 60 प्रतिशत बिलों को कमेटी के पास भेजा गया वही 15वी लोकसभा में 71 प्रतिशत बिलों को कमिटी के पास भेजा गया 16वी लोकसभा में मात्र 27 प्रतिशत बिलों को ही कमेटी के पास भेजा गया।

यह आकड़ा कही न कही यह दर्शाता हैं की सरकार किस तरह से कमेटी से बचने की जुगत लगा रही हैं.क्यूंकि अगर बिल कमेटी के पास जाता हैं तो वहा चर्चा होगी कानून में संशोधन के सुझाव दिए जायेंगे और कानून के अलग अलग बिंदु पर वैचारिक असहमति भी उत्पन हो सकती हैं जो की सरकार के ड्राफ्ट को कटघरे में खड़ा कर सकती हैं।संसदीय व्यवस्था

जिससे बचने के लिए भी संभवतः सरकारे कानूनी बिलों को कमेटी के पास नहीं भेजती हैं जो की आकडे दर्शा भी रहे हैं जो की वैचारिक लोकतंत्र के लिए सही संकेत नहीं हैं।

संसद का सबसे महत्वपूर्ण समय प्रशन काल जहा विपक्ष सरकार से सवाल पूछता हैं ओर सरकार की देश के प्रति जवाबदेही तय करता हैं वह प्रशनकाल भी हंगामे की भेट चढ़ गया ओर मात्र प्रशनकाल के कुल निर्धारित समय का मात्र 35 प्रतिशत कार्य ही लोकसभा में प्रशनकाल के दौरान चला ओर यही यथास्थिति राज्यसभा में भी रही राज्यसभा में भी मात्र 25 प्रतिशत काम ही प्रशनकाल के दौरना हुआ।

इस प्रशनकाल के दौरान विपक्ष सामाजिक सरोकार और जनहित के प्रशन पूछकर जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही तय कर सकती थी।लेकिन विपक्ष अपनी हठधर्मिता पर अड़ा रहा और सरकार भी सवाल का जवाब देने जैसे भरी भरकम काम से बच कर निकल गयी ओर पुरे सत्र के दौरान मात्र 20 प्रतिशत सवालो का ही जवाब मौखिक रूप से सरकार द्वारा सदन में दिया गया।संसदीय व्यवस्था

जिनका जवाब सरकार ने दिया उसने सदन से सडक तक बवाल मचा दिया चाहे कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की वजह से किसी की मृत्यु नहीं हुई यह जवाब हो।इसलिए भी सरकार चाहती हैं की सदन में अधिक से अधिक हंगामा और कम से कम सवाल हो जिससे सरकार की छवि प्रभावित न हो।

भारतीय लोकतंत्र के लिए सही संदेश हैं

भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार हैं संवाद ओर अगर देश के सर्वोच्च निकाय से ही यह सोच विलुप्त होती नज़र आएगी तो कही न कही यह सामाजिक अनुबंध की भारतीय राजनितिक व्यवस्था का गर्भपात दर्शाता हैं जहा आम नागरिक अपने जनप्रतिनिधि को इस सोच के साथ यह ताकत देते हैं की वह संसद में विराजमान जन प्रतिनिधि उनके हितो को सार्थक करने वाला फैसला लेंगे या बहस करेंगे जहा आम जन के हित सार्थक नहीं होंगे।

संसद के इस सत्र में देखने को मिला की किस तरह संसद के इस सत्र को हुडदंगी सत्र में परिवर्तित कर दिया गया. संसद के इस सत्र में सत्ता और विपक्ष की हठधर्मिता साफ़ साफ़ देखने को मिली।विपक्ष सत्ता से यह अपेक्षा कर रहा था की सदन उनके सोच के अनुरूप चले और सत्ता यह सोच रहा था की हम विपक्ष की मांग के आगे झुककर कर अपनी पराजय ओर हार कैसे स्वीकार करे.संसदीय व्यवस्था

संसद समन्वय और संवाद के साथ चलती हैं ना की बहुमत से जिस तरह संसद में बिल पास किये गए मानो लोकतंत्र का मतलब सिर्फ बहुमत हो गया हो जहा संवेधानिक मूल्य गौण हो गए हो। सदन शांति से चले जितनी जिम्मेदारी विपक्ष की हैं उतनी ही सत्ता पक्ष की भी हैं क्यूंकि लोकतंत्र के सर्वागीण विकास के लिए विपक्ष की सहभागिता को बहुमत के सिंहासन के नीच नहीं रौंदा जा सकता हैं।

वही दूसरी और विपक्ष को मूल्यांकन करने की आवश्कता हैं की सिर्फ निजी राजनितिक हितो के लिए जन सरोकार के अन्य विषयों को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता इस सत्र में विपक्ष सिर्फ पेगासस और किसान बिलों पर चर्चा को लेकर अड़ा रहा ओर सदन का यह सत्र हंगामे की भेट चढ़ गया।

लेकिन इसके साथ ही कई जन सरोकार के अन्य मुद्दे भी पीछे छुट गए जैसे की महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य ओर पेट्रोल डिजल कि गगन चुंबी कीमते और सत्ता भी शांत रहा की ना सदन चलेगी न चर्चा होगी न सवाल होंगे और ना जवाब देने पड़ेंगे।संसदीय व्यवस्था

इसलिए सरकार  की तरफ से गतिरोध ख़त्म करने के लिए कोई ख़ास प्रयास भी नहीं किये गए जनता का पैसा बर्बाद होता रहा विपक्ष हंगामा करता रहा सत्ता मौन रहा ओर जनता हमेशा की तरह इस हंगामे के बीच अपने लिए न्याय तलाशती रही।

सत्ता को समझने की आवश्यकता हैं की संवेधानिक व्यवस्था से जनतांत्रिक मूल्य आयेंगे न की बहुमत से जनतांत्रिक मूल्यों का उदय होगा और विपक्ष को विवेचना करने की आवश्यकता हैं की सदन के भीतर सामाजिक हितो की रक्षा लिए लादे न की अपने राजनितिक हितो को साधने का प्रयास करे और सरकार को जतना के प्रति जवाबदेह बना रही हैं कुछ इस तरह की छवि जनता के बीच में स्थापित करे न की एक अवरोधी विपक्ष वाली छवि।

संपादक-राकेश मोहन सिंह                

 

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