मनोरंजन

अपने अभिनय से अमर हो जाने वाला खलनायक

“मोगैम्बो खुश हुआ”, (जिस दिन मैं कोई गोरी तितली देख लेता हूँ न…मेरे खून में सैकड़ों काले कुत्ते एक साथ भौंकने लगते हैं,) (पैसों के मामले में मैं पैदाईशी कमीना हूँ…दोस्ती और दुश्मनी का क्या अपनों का खून भी पानी की तरह बहा देता हूँ) और हमारा रास्ता काटने वाली कोई भी बिल्ली जिंदा नहीं रहती| जब भी हमारे कानों में ऐसे संवाद सुनाई पड़ते हैं तो हमारे दिमाग में एक लम्बे, चौड़े, डरावनी आँखों और खौफ़नाक चेहरे वाले व्यक्ति की तस्वीर उभरती है| उस आदमी का नाम है…..”अमरीश पुरी”|

अमरीश पुरी वह नाम है जिसने हिंदी सिनेमा में विलेन के किरदार को अपने सशक्त अभिनय के दम पर बुलंदियों के पार पहुंचा दिया| अमरीश पुरी के पहले भी हिंदी सिनेमा में नकारात्मक किरदारों का चित्रण होता था लेकिन उस वक़्त फिल्म के निर्देशकों का ध्यान मुख्य अभिनेताओं के चरित्र को उभारने में ज्यादा होता था| यह अमरीश पुरी ही थे जिनके सिनेमा में पदार्पण के बाद विलेन के लिए विशेष रूप से ऐसे-ऐसे किरदार गढ़े गए जो फिल्मों में मुख्य अभिनेताओं के किरदार पर भी भारी पड़ते थे| इस चलन  की अगुवाई की थी स्वयं अमरीश पुरी ने| अपने अभिनय, वेषभूषा, संवाद और चेहरे के भावों द्वारा विलेन के किरदारों में खौफ और डर पैदा कर देने वाले अमरीश पुरी जैसा विलेन न उनके पहले था, ना उनके बाद हुआ, ना आगे होगा|

थियेटर से निकले अमरीश

अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को लाला निहाल चंद और वेद कौर के यहां पंजाब राज्य के जालंधर में हुआ था। अमरीश पुरी अपने पांच भाई बहनों में चौथे नम्बर पर थे| अमरीश पुरी फिल्मों में आने से पहले थियेटर में काम किया करते थे और स्टेज के बड़े कलाकारों में शुमार किए जाते थे| नाटकों में उनके योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार भी दिया गया था| कहते हैं की जब पहली बार अमरीश पुरी फिल्मों में हीरो बनने के लिए स्क्रीन टेस्ट देने गए थे तो असफल हो गए थे| लेकिन उनकी इस असफलता ने उन्हें निराश नहीं किया| अमरीश पुरी ने 10 साल तक सरकारी नौकरी करने के साथ साथ उस समय के बड़े नाटककारों “सत्यदेव दुबे” तथा “गिरीश कर्नार्ड” के साथ पृथ्वी थियेटर में नाटक किया|

सिनेमाई सफर

1971 में 39 वर्ष की उम्र में जब लोग सिनेमा में काम करने की उम्मीद छोड़ देतें हैं, अमरीश पुरी की पहली हिन्दी फिल्म प्रदर्शित हुई जिसका नाम था “रेशमा और शेरा”| यह अमरीश पुरी के अन्दर का कलाकार ही था जिसने उम्र के 39 वें बसंत में पहुंचने के बाद भी खुद को अन्दर से मरने नहीं दिया था| बाद में जो हुआ वो हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम इतिहास बन गया| अमरीश पुरी ने अपने 34 साल के लम्बे फ़िल्मी करियर में लगभग 400 फ़िल्में की| जिनमें निभाए गए यादगार किरदारों ने अमरीश पुरी को हिंदी सिनेमा में अमर बना दिया| अमरीश पुरी अपने किरदारों को इतनी शिद्दत और खतरनाक तरीके से जीते थे कि विलेन के रूप में उनका होना फिल्म की सफलता की गारंटी हुआ करती थी| उनके द्वारा निभाए गए नकारात्मक किरदारों का इतना असर और कहर था की लोग वास्तविक ज़िन्दगी में भी उनसे डरने लगे थे| यह एक कलाकार के रूप में अमरीश पुरी की सफलता थी| आज भी अमरीश पुरी के द्वारा निभाए गए किरदारों को चुनौती देना वर्तमान के किसी कलाकार के बस की बात नहीं है|

सफलता का राज

अमरीश पुरी की फिल्मों में उनके चरित्र की सफलता के पीछे उनका कठिन परिश्रम था| अमरीश हमेशा अपनी बुलंद आवाज़, संवाद अदायगी तथा अपने चरित्रों पर प्रतिदिन घंटों मेहनत किया करते थे| यही कारण था की वे अपने दौर में औरों से अलग और सफल थे|

यादगार फ़िल्में

वैसे तो अमरीश द्वारा निभाए गए सारे किरदार कलात्मक दृष्टिकोण से बेहतरीन हैं, लेकिन कुछ ऐसी फ़िल्में जिनमें उनका किरदार “लार्जर देन लाइफ” हो गया है। वह हैं मिस्टर इंडिया, शहंशाह, करण-अर्जुन, कोयला, दिलजले, विश्वात्मा, राम-लखन, तहलका, गदर, नायक, दामिनी आदि| इन सभी सुपरहिट फिल्मों में अमरीश पुरी का योगदान इस फिल्म के नायकों से किसी स्तर पर कम नहीं था|

सकारात्मक भूमिकाओं में भी उतने ही सफल

अमरीश पुरी एक मुकम्मल अभिनेता थे, इस बात की गवाही उनकी वे सुपरहिट फ़िल्में हैं जिनमें निभाए गए सकारात्मक चरित्र की भूमिकाओं में भी वे उतने ही सफल रहे जितनी सफलता उन्हें नकारात्मक भूमिकाओं में मिली थी| दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के चौधरी बलदेव सिंह और उनका संवाद “जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िन्दगी” आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं| परदेश, विरासत और भी कई फ़िल्में है जिनमें अमरीश पुरी द्वारा निभाया गया नेकदिल किरदार लोगों के दिलों में अपनी जगह बना गया| अमरीश पुरी की आवाज़ में गाया गाना “ आई लव माई इण्डिया” जैसे देश की धडकनों में बसा गीत है|

हॉलीवुड से नाता-

हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग के अनुसार अमरीश पुरी उनके पसंदीदा अभिनेता थे| स्टीवन ने एक बार कहा था कि अमरीश पुरी जैसा विलेन पूरी दुनिया में न कहीं हुआ है न होगा| स्टीवन स्पीलबर्ग ने अपने द्वारा निर्देशित हॉलीवुड फिल्म “Indiana Jones and the Temple of Doom (1984)” में अमरीश पुरी को मोला राम की भूमिका दी थी, इस चरित्र को काफी सराहा गया था|

मृत्यु-

लगभग तीन दशकों तक दर्शकों का मनोंरंजन करने वाले अमरीश पुरी की मृत्यु 12 जनवरी 2005 को कैंसर की बीमारी के कारण हो गई| उन्हें ब्लड कैंसर था|

वास्तविक ज़िन्दगी-

अपने फ़िल्मी सफ़र में ना जाने कितने नकारात्मक और सकारात्मक चरित्र निभाने वाले अमरीश पुरी वास्तविक ज़िन्दगी में एक बेहद शांत, नेकदिल और सभी से प्यार करने वाले इंसान थे| उनके जाने के बाद से जो स्थान रिक्त हुआ है उसे बॉलीवुड अभी तक भर नहीं पाया है| अमरीश पुरी के साथ कई फिल्मों में काम कर चुके दिग्गज अभिनेता रजा मुराद ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जिस तरह बॉलीवुड में एक अमिताभ बच्चन हैं उसी तरह सिर्फ एक ही अमरीश पुरी थे| रज़ा मुराद का यह वक्तव्य अमरीश पुरी की शख्सियत को बयान करने के लिए काफी है|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शेयर करें