राष्ट्रीय

कनार्टक में थमा सियासी घमासान

कुमारस्वामी नहीं कर पाए विश्वास मत हासिल, कर्नाटक सरकार गिरी

वर्तमान में देश की राजनीति में जिस तरह के घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं ऐसे घटनाक्रम शायद ही किसी फिल्म में देखने को मिलते होंगे। इस घटनाक्रम में सबसे पहला नाम कनार्टक का है और दूसरा नाम गोवा का है। इन दोनों में सबसे ज्यादा गंभीर हालात कर्नाटक के हैं। वैसे उपरी तौर पर देखा जाए तो दोनों के हालात एक जैसे ही हैं पर कनार्टक की राजनीति इसमें ज्यादा हावी रही। पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में सियासी उठा पटक काफी तेज रही है। इसके चलते कर्नाटक में पल- पल सियासी समीकरण बदल रहे थे। इससे पहले कुछ इसी तरह के हालात उत्तराखंड की राजनीति में भी देखने को मिल चुके हैं।

कर्नाटक में गिर गई कांग्रेस जेडीएस सरकार

कर्नाटक में पिछले कई दिनों से चल रहे सियासी उठा पटक का मंगलवार (23 जुलाई) को अंत हो गया। मंगलवार 23 जुलाई को हुए फ्लोर टेस्ट में कुमारस्वामी की सरकार असफल रही और इस तरह बहुमत साबित नहीं कर पाने की स्थिति में 14 महीने बाद कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार गिर गई। मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने में विफल रहने के तुरंत बाद मंगलवार 23 जुलाई को देर शाम राज्यपाल वजूभाई वाला को अपना इस्तीफा सौंप दिया जिसे राज्यपाल ने तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया। राज्यपाल ने कुमारस्वामी का इस्तीफा स्वीकार करने के साथ ही उनसे अगली व्यवस्था होने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रुप में पद पर बने रहने का अनुरुोध किया है। लेकिन इस दौरान उनसे कोई नीतिगत निर्णय नहीं लेने को कहा है।

मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी की तरफ से लाए गए विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 99 और विरोध में 105 मत पड़े। कांग्रेस और जद (एस) के 15 विधायकों के इस्तीफा देने से गठबंधन सरकार अल्पमत में आ गई थी। गठबंधन के नेताओं ने सरकार बचाने की भरसक कोशिश की। मुख्यमंत्री ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान कराये जाने से बचने के कई ‘उपाय’ किए। चार दिन चली चर्चा के बाद मतदान हुआ जिसका नतीजा गठबंधन दलों के विपरीत गया और आखिरकार सरकार गिर गई। कुमारस्वामी सरकार 23 मई 2018 को बनी थी। विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था जिसके बाद कांग्रेस तथा जनता दल (एस) ने गठबंधन सरकार बनायी थी। कांग्रेस के ज्यादा विधायक होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद जद(एस) को दिया गया था। सरकार बनने के कुछ समय बाद ही गठबंधन में मतभेद उभरने लगे थे। गठबंधन के 15 विधायकों के इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष ने तुरंत स्वीकार नहीं किये थे। इसके मद्देनजर इन विधायकों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफे स्वीकार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था। न्यायालय ने इस पर अपने फैसले में इस्तीफों का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ दिया था लेकिन कहा था कि इन सदस्यों को विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

इससे पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 104 विधायकों और कांग्रेस के 79 विधायकों ने जीत दर्ज की थी। इसके अलावा जनता दल(सेक्युलर) के 37 विधायकों, निर्दलीय विधायक आर शिवशंकर, बसपा के एक विधायक और केपीजेपी के एक विधानसभा ने इस चुनाव में जीत दर्ज की थी। शुरूआती दौर में कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार के पास 118 विधायकों का समर्थन था जबकि बहुमत का आकंड़ा 113 है। कनार्टक में हालात तब बिगड़े  जब कांग्रेस—जेडीएस गठबंधन के 15 विधायकों के इस्तीफा देने की बात सामने आई। सभी विधायकों ने अपना इस्तीफा संसद स्पीकर की अनुपस्थिति में दिया, जिस वजह से उन विधायकों का इस्तीफा मंजूर नही हुआ था।

कर्नाटक में सियासी घमासान इस प्रकार रहा।

1 जुलाई: विजयनगर के विधायक आनंद सिंह ने औने-पौने दाम पर 3,667 एकड़ जमीन जेएसडब्ल्यू स्टील को बेचने को लेकर अपनी नाखुशी प्रकट करते हुए विधानसभा से इस्तीफा दिया।

6 जुलाई: कांग्रेस के नौ और जदएस के तीन विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय में उनकी गैर हाजिरी में इस्तीफा सौंपा।

7 जुलाई : मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी अमेरिका यात्रा से लौटे।

8 जुलाई: सभी मंत्रियों ने बागियों को शांत/संतुष्ट करने के वास्ते उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के लिए अपने अपने पार्टी नेताओं को इस्तीफा दिया। दो निर्दलीय विधायकों– एच नागेश और आर शंकर ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया और सरकार से समर्थन वापस लिया। उन्होंने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान किया।

9 जुलाई: कांग्रेस ने पार्टी विधायक दल की बैठक बुलायी,20 विधायक नहीं पहुंचे। एक अन्य विधायक रौशन बेग ने विधानसभा से इस्तीफा दिया।

10 जुलाई: दो और कांग्रेस विधायकों– एम टी बी नागराज और डॉ. के सुधाकर ने इस्तीफा दिया।

17 जुलाई: उच्चतम न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में व्यवस्था दी कि 15 बागी विधायकों को वर्तमान विधानसभा सत्र की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

18 जुलाई: कुमारस्वामी ने विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया।

19 जुलाई: राज्यपाल वजूभाई वाला ने शुक्रवार तक ही मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए दो समयसीमाएं तय कीं। कुमारस्वामी ने निर्देश का उल्लंघन किया। विधानसभा 22 जुलाई तक स्थगित की गयी।

23 जुलाई: विश्वास प्रस्ताव गिरा। उसके पक्ष में 99 और विपक्ष में 105 वोट पड़े। 14 माह पुरानी सरकार गिरी।

गोवा में भी पलटा पासा

कर्नाटक के बाद अगर बात की जाए तटीय राज्य गोवा की तो यहां की स्थिति भी लगभग कर्नाटक जैसी ही है। गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस के पास महज अब 5 विधायक रह गए हैं। अब बीजेपी को गोवा में सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का सहारा नही लेना पड़ेगा। वर्तमान में 40 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के अब 27 विधायक हो गए हैं। भाजपा में शामिल होने वाले विधायकों में अतानासियो मोन्सेराते, जेनिफर मोन्सेराते, फ्रांसिस सिल्वेरा, फिलिप नेरी रॉड्रिग्स, सी डियाज, विल्फ्रेड डीसा, नीलकांत हलारंकार और इसिडोर फर्नांडीज शामिल हैं।

गोवा में भाजपा में शामिल हुए कावलेकर समेत अन्य विधायकों ने इसके पीछे तर्क दिया है कि विपक्ष में होने के कारण उनके निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों में बाधाएं आ रही थीं। इस वजह से उन्हें भाजपा में शामिल होना पड़ा। साथ ही उनका कहना है कि वे बिना किसी शर्त भाजपा में शामिल हुए हैं। हालांकि गोवा में पहले से ही भाजपा अपनी सरकार चला रही है, जिस वजह से कांग्रेस को इतना झटका नही लगा पर कर्नाटक में 14 महीने पुरानी सरकार का सत्ता  का हाथ से जाना कांग्रेस को भारी पड़ा। एक तरफ कांग्रेस पार्टी देश में अपने वजूद को तलाश रही है वहीं कर्नाटक और गोवा में विधायकों का बागी होकर भाजपा में शामिल होना, किसी सदमें से कम नही है। एक तरफ पहले ही देश में कांग्रेस गठबंधन की गिनी—चुनी सरकारें हैं अब वो भी धीरे—धीरे हाथ से खीसकती हुई नजर आ रही है। कहीं यह स्थिति कांग्रेस के लिए आने वाले समय की खतरे की घंटी न बन जाए। इसका असर बाकि के राज्यों पर पड़े इससे पहले कांग्रेस को स्थिति पर काबू पाना ही होगा।

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