अंतर्राष्ट्रीय

कश्मीर के बाद अब POK और COK की बारी

गृहमंत्री अमित शाह लोकसभा में धारा 370 को हटाने सम्बंधित प्रस्ताव लोकसभा में पेश कर रहे थे। प्रस्ताव पर बहस भी तेज़ हो रही थी। विपक्ष के सांसदों ने इस प्रस्ताव में जब POK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन ) की बात उठाई तो गृहमंत्री अमित शाह ने साफ़ कर दिया, “जब हम कश्मीर की बात करते हैं तो उसमें pok और अक्साई चीन भी शामिल है। हमारा नजरिया साफ़ है ,कश्मीर की एक-एक इंच भूमि के लिए जान दे देंगे। सम्पूर्ण कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। “गृहमंत्री के बयान से एक बात तो साफ़ है कि भारत सरकार pok  और अक्साई चीन पर भी अग्रेसिव निर्णय लेने के पक्ष में है। हांलाकि विपक्षी पार्टी कांग्रेस इस मुद्दे पर बिखरी-बिखरी नजर आई, कांग्रेस के ही कुछ शीर्ष नेतृत्व ने फैसले का स्वागत किया तो कांग्रेस पार्टी ने सरकार के इस निर्णय का विरोध किया; इससे साफ़-साफ़ प्रतीत होता है कि मजबूत नेतृत्व के अभाव के साथ दूरदर्शिता की भी कमी है। लेकिन कश्मीर और pok की वर्तमान दशा के लिए इतिहास कांग्रेस की ही गलती बयां करता है।

महाराजा हरि सिंह एक योग्य और परिश्रमी शासक जरूर थे लेकिन उनमें दूरदर्शिता और अनिर्णय के दोष भी विद्यमान थे। 1932 में शेख अब्दुल्ला ने एक बड़ा आंदोलन चलाया, शुरुआत में यह मजहबी आंदोलन था, जो मुसलमानों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया गया था। 1939 में आंदोलन का कौमी स्वरूप खत्म कर दिया गया और नाम “कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस” से बदलकर “नेशनल कांन्फ्रेंस” कर दिया गया और इस आंदोलन के आगे हरि सिंह बेबस नजर आये। हांलाकि यह रोचक तथ्य है कि सम्पूर्ण कश्मीर को हरि सिंह और उनके परिवार ने अंग्रेजों से खरीदकर बसाया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस महाराजा हरिसिंह के खिलाफ आंदोलन चलाती रही और 1946 में कांग्रेस आंदोलन से प्रेरणा लेकर शेख अब्दुल्ला ने ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन छेड़ दिया। शेख गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें तीन साल की सजा हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया भावुकतापूर्ण था। वे जून 1946 में अपने गिरफ्तार मित्रों (खासकर शेख अब्दुल्ला) को प्रोत्साहित करना चाहते थे। उनके इस रवैय से सरदार पटेल काफी चिंतित थे।

जून 1947 में देश की विभाजन योजना घोषित हुई। इसके साथ ही राज्य यानी कश्मीर में भी परिस्थितियां बदलने लगीं। लॉर्ड माउण्टबेटन ने महाराजा से कहा कि सत्ता के हस्तांतरण के लिए निश्चित हुई तारीख 15 अगस्त 1947 से पहले आपको संबंधित परिस्थितियों के प्रकाश में भारत या पाकिस्तान से जुड़ने का निर्णय कर लेना चाहिए। परन्तु हरि सिंह तत्काल निर्णय लेने में असफल रहे।

15 अगस्त 1947 को देश का विभाजन हो गया। पाकिस्तानी आतंकवाद जो आज तक कश्मीर को चैन नहीं लेने दे रहा है, यह पाकिस्तान की पैदाइश के साथ ही शुरू हो गया था। सीमा पार से कबाइलियों को कश्मीर पर आक्रमण के लिए उकसाया जाने लगा। पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें हथियार दिए और घुसपैठ की गुंजाइश भी बनाई गई। पाकिस्तान से किए गए कबाइली आक्रमण अक्टूबर, 1947 में बढ़ने लगा। नेशनल कॉन्फ्रेंस और महाराजा की फौज कमजोर साबित हुयी और इस राज्य का काफी बड़ा भाग, जिसमें पहले गिलगित नाम से पुकारा जाने वाला सीमा स्थित भू-भाग भी था, शत्रु के हाथ में चला गया था। राजधानी तथा कश्मीर घाटी के लिए गंभीर संकट की आशंका खड़ी हो गई थी। महाराजा ने इस संकटपूर्ण स्थिति में भारत से जुड़ने का प्रस्ताव रखा और सैनिक मदद की मांग की। भारत सरकार ने राज्य के सम्मिलन को स्वीकार किया और इस तरह बाद में कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग हो गया।

लॉर्ड माउण्टबेटन के अनुरोध पर इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता की विनती का निर्णय लिया गया और 1 जनवरी 1948 को शिकायत की गई। सरदार वल्लभ भाई पटेल व्यक्तिगत रूप से इससे सहमत नहीं थे। उनका मानना था “राष्ट्र संघ मामले को लंबा खींचेगा और फिर भी शिकायत रखनी ही है तो भारत वादी की बजाय प्रतिवादी बने।” लेकिन बाद में यह मामला तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के अधीन विदेश मंत्रालय में चला गया। बाद में पाकिस्तान ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया कि कश्मीर पर हुए आक्रमण में उसका सीधा हाथ था। हालांकि राष्ट्र संघ के कमीशन ने पाकिस्तान की पोल खोल दी और कश्मीर में बचे पाक सैनिकों को तुरंत हटाने का प्रस्ताव रखा। परंतु तत्पश्चात भारत सरकार जवाहर लाल नेहरू की अगुआई में झुक गई। युद्ध विराम, युद्ध विराम रेखा और 5 जनवरी 1949 का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया जिसमें पाकिस्तान के प्रति झुकाव था। इससे भारत-पाकिस्तान बराबरी के दर्जे पर खड़े हो गए। राष्ट्र संघ कमीशन का 13 अगस्त 1948 का वह प्रस्ताव जो पाकिस्तान को अपराधी बता रहा था, मंद पड़ गया।

1947 के हमले के बाद काफी कुछ बदल गया था। उस समय पाकिस्तान से हुई लड़ाई के बाद कश्मीर 2 हिस्सों में बंट गया। कश्मीर का जो हिस्सा भारत से लगा हुआ था, वह जम्मू-कश्मीर नाम से भारत का एक सूबा हो गया, वहीं कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सटा हुआ था, वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहलाया। 13 लाख वर्ग किलोमीटर वाले इस नूर को पाकिस्तान ने अपने कब्जे में कर रखा है और पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर को भारतीय कश्मीर और चीन के जिंगजियांग में आतंकवाद फैलाने के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर बना दिया है, लेकिन चीन की गतिविधियां बढ़ने के कारण उसने ‍अपना फोकस पूर्णत: कश्मीर पर कर दिया। यहां के कश्मीरियों को पाकिस्तान ने ‘आजादी’ का सपना दिखाया है लेकिन यह सच नहीं है, क्योंकि वह समूचे कश्मीर को ही पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहता है और युवाओं को भटकाकर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता आया है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अक्साई चिन शामिल नहीं है। यह इलाका महाराजा हरिसिंह के समय में कश्मीर का हिस्सा था। 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद कश्मीर के उत्तर-पूर्व में चीन से सटे इलाके अक्साई चीन पर चीन का कब्जा है। पाकिस्तान ने चीन के इस कब्जे को मान्यता दी है। जम्मू-कश्मीर और अक्साई चीन को अलग करने वाली रेखा को “लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल” (एलएसी) यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा कहा जाता है।

भारत लगातार हर मंच पर ना केवल कश्मीर, बल्कि PoK और अक्साई चीन को भी अपना अभिन्न अंग बताता है। क्योंकि दोनों ही अविभाजित जम्मू-कश्मीर, जिसे महाराजा हरि सिंह ने भारत को सौंपा था,का ही अंग है। और इतिहास को देखें तो पता चल जायेगा कि बौद्ध,हिन्दू और मुस्लिम धर्म से पनपा यह क्षेत्र अविभाजित भारत का ही हिस्सा है, जिसकी संस्कृति को पाकिस्तान ने बार-बार अपने नापाक इरादों के कारण रक्तरंजित और बर्बाद किया है। इसकी संस्कृति और वहां मानव अधिकारों की रक्षा के लिए जल्द ही भारत सरकार बड़ा कदम उठा सकती है। इसके लिए सरकार दोनों क्षेत्रों के विदेश में रहने वाले निवासियों से संपर्क कर रही है और भविष्य में यहां से भी भारत के लिए अच्छी खबर की उम्मीद की जा सकती है और ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत”  का हमारा स्वप्न जल्द ही साकार हो सकता है।

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