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निराश जीवन जीने के बावजूद जीवन के विभन्न प्रसंगों पर रची अद्भुत रचनाएं

हिन्दी साहित्य में महाप्राण के नाम से जाने जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का आज जन्मदिन है|  जीवन को अपने अनमोल शब्दों से सजाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फ़रवरी 1896 को बंगाल के मिदनापुर में हुआ था| उनके पिता राम सहाय त्रिपाठी एक सरकारी कर्मचारी थे| निराला का जीवन काफी उतार चढ़ाव और दुखों से भरा रहा, वे जब बहुत छोटे थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया| छोटी उम्र में उनकी शादी कर दी गई| शादी के बाद के कुछ वर्ष अच्छे बीते लेकिन निराला जब मात्र 20 वर्ष के थे तभी उनकी पत्नी का भी देहांत हो गया| अब उनके जीवन का सहारा थी उनकी बेटी| लेकिन उनकी बेटी विवाह के बाद विधवा हुई और फिर कुछ दिनों बाद वो भी चल बसी| एक ही जीवन में इतने दुःख झेलने वाले निराला अपने दुःख को भूलने के लिए साहित्य के पास चले जाया करते थे| साहित्य के प्रति निराला के इसी प्रेम ने हिन्दी साहित्य को उसका महाप्राण दिया|

इलाहबाद जो अब प्रयागराज हो चुका है, निराला की कर्मभूमि है| इलाहबाद की सड़कों पर घूमते हुए, इलाहबाद की हवाओं को महसूस करते हुए और इलाहबाद के जीवन को खुद में समाहित करते हुए सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने हिन्दी साहित्य को अनेक अमर रचनाएं दी| पूरी ज़िन्दगी आर्थिक रूप से संघर्ष करने वाले निराला के जीवन में खुशियाँ थी ही नहीं, दुःख ही उनका साथी रहा| लेकिन अपने दुःख को भूलकर निराला जब साहित्य रचने बैठते तो पूरी दुनिया का दुःख बयां कर देते थे| इसका सबसे बड़ा उदहारण है उनकी सुप्रसिद्ध कविता “वह तोड़ती पत्थर”

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
श्याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार-बार प्रहार
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार
चढ़ रही थी धूप
गर्मियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिनगीं छा गई

प्रायः हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं
सज़ा सहज सितार
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा
“मैं तोड़ती पत्थर।”

इस कविता में कड़ी धूप में अपने परिवार के भरण पोषण के लिए पत्थर तोड़ती एक महिला का चित्रण किया गया है| यह चित्रण सिर्फ एक महिला का नहीं बल्कि काम करने वाले हर उस मजदूर का है, जो अपने परिवार को पालने के लिए कड़ी धूप हो या हाड़ कंपाती ठंड, पेट में अनाज हो या न हो, शरीर पर कपड़े हो या न हों लेकिन मजदूर मेहनत करते हैं| यह कविता दुनियाभर के मजदूर वर्ग के जीवन का वास्तविक चित्रण है|

इस कविता के अलावा सूर्यकांत त्रिपाठी ने जो अन्य रचनाएं रची हैं जिनमें

  • कविता श्रेणी में

राम की शक्ति पूजा

सरोज स्मृति

आराधना

अनामिका

गीतिका

कुकुरमुत्ता

  • उपन्यास श्रेणी में

अप्सरा

प्रभावती

निरुपमा

चमेली

आदि प्रमुख हैं| निराला ने कहानी संग्रह, लेख संग्रह आदि भी लिखे हैं, जिन्हें आप को ढूँढ़ ढूँढ़ कर पढ़ना चाहिए| हिन्दी साहित्य को अपने अनुपम कृतियों से समृद्ध करने वाले निराला का निधन 65 वर्ष की आयु में 15 अक्तूबर 1961 को हो गया| लेकिन साहित्यकार मरते नहीं अमर हो जाते हैं ठीक उसी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के नाम की रौशनी हर बीतते दिन के साथ फैलती जा रही है|

पंकज कुमार, (मीडिया दरबार)

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