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चौथी बार मध्यप्रदेश की कमान सँभालने वाले शिवराज के आगे है कई चुनौतिया

मध्यप्रदेश में भाजपा का ऑपरेशन लोटस कामयाब हो चुका है| शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं| विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद  सोमवार यानि की 23 मार्च की रात लगभग 9 बजे एक बिलकुल ही सादे समारोह में मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल लाल जी टंडन ने शिवराज सिंह चौहान को पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी|

इस अवसर पर दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में शिवराज ने कहा कि फिलहाल जिस वायरस ने दुनिया के साथ साथ अपने देश में भी लोगों में भय और आतंक का माहौल बना रखा है उससे लड़ना उनकी पहली प्राथमिकता होगी| जाहिर है शिवराज कोरोना कि बात कर रहे थे|

शिवराज के मुख्यमंत्री पद पर चयन का आधार

भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी सूत्रों की अगर माने तो मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान का चयन इतना आसान नहीं था| पार्टी के अंदर से ही कई नाम उन्हें चुनौती देते हुए दिख रहे थे| शिवराज सिंह चौहान के अलावा जिन अन्य नामों की चर्चा मुख्यमंत्री पद के लिए चल रही थी उनमें केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा का नाम शामिल था| कभी कभी नाम कैलाश विजय वर्गीय का भी उछला| लेकिन अंत में बाजी मध्यप्रदेश में मामा के नाम से मशहुर शिवराज सिंह चौहान के हाथ लगी|

मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान के चयन का सबसे बड़ा कारण उनका अपना व्यक्तित्व ही रहा| शिवराज सिंह चौहान आज भी किसी भी अन्य नेताओं से राज्य में ज्यादा लोकप्रिय हैं| ज़मीनी नेता माने जाते हैं और पुरे प्रदेश में उनकी पकड़ है| भाजपा के विजयी विधायकों में भी वे सर्वमान्य हैं और भाजपा ने आखिरी विधानसभा चुनाव भी उन्हीं को आगे कर लड़ा था जिसमे बहुत ही मामूली अंतर से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था|

इसके अलावे मध्यप्रदेश में तक़रीबन 25 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव भी होने हैं, जिसके लिए शिवराज जैसा चेहरा भाजपा के पास नहीं है, जिसके दम पर वे कह सके की वे ज्यादा से ज्यादा सीटें पार्टी को दिला सकते हैं|

शिवराज सिंह चौहान के साथ जातिगत फैक्टर भी काम कर गया| मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल अन्य नेता सवर्ण समुदाय से आते हैं जबकि शिवराज सिंह चौहान ओबीसी समुदाय से| इसलिए संघ के साथ पुराने और मजबूत संबंधों और जातिगत समीकरणों को साधते हुए शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद बने|

इन सभी कारणों के अलावा शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री पद पर चुने जाने का अहम कारण है उनकी नेताओं के मध्य संतुलन स्थापित करने की दक्षता| जब उपचुनाव होंगे और सिंधिया समर्थक विधायक जीत कर आएँगे तो पूर्व के वादेके अनुसार उन्हें मंत्री बनाना होगा , कांग्रेस और सपा, बसपा के साथ साथ अपने विधायकों और दिग्गज नेताओं को संतुष्ट करना होगा| कहीं ऐसा न हो की बाहर से आए नेताओं को संतुष्ट करने में अपने ही नाराज़ हो जाए ऐसी स्थिति को सिर्फ शिवराज ही संभाल सकते हैं| इन्हीं कारणों को देखते हुए भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने किसी अन्य नेता को ज़िम्मेदारी देने की जगह शिवराज को ही प्राथमिकता दी|

चौहान की चुनौतियाँ

मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की चुनौती को पार करने के बाद शिवराज सिंह चौहान की असल समस्या  राज्य में कोरोना वायरस की वजह से हुई खराब हुई स्थिति को संभालने के साथ साथ मंत्रिमंडल के गठन की है| जैसा की हम जानते हैं कि मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार में वापसी के एकमात्र कारण हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया| सिंधिया समर्थक 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद ही मध्यप्रदेश में सत्ता का समीकरण बदला और भाजपा राज्य की सत्ता में वापसी कर सकी|

शिवराज सिंह चौहान उपचुनाव के बाद जीत कर आने वाले सिंधिया समर्थक विधायकों और अपनी पार्टी के नेताओं को उचित सम्मान देने में किस प्रकार संतुलन बना पाएंगे| यह वक़्त के साथ पता चलेगा|

पंकज कुमार, मीडिया दरबार

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