राष्ट्रीय

देश के निजी स्कूलों की फीस वसूलने का मसला अब हल करेगा सुप्रीम कोर्ट?

 

देशभर में 25 मार्च से लगे संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूलों के फीस लेने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। देश के दस राज्यों के अभिभावकों के संघ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस याचिका में कहा गया है कि निजी स्कूल बेमाने ढंग से फीस वसूल रहे हैं, जिस पर रोक लगाए जाए। इसके अलावा याचिका में कहा गया कि कई निजी स्कूलों ने लॉकडाउन के दौरान की फीस भी वसूली है, जिसे लेकर अभिभावकों पर दबाव बनाया गया।

अभिभावकों के संघ ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि वे ऐसी व्यवस्था करें, जिससे निजी स्कूलों की मनमानी फीस वसूलने के रवैऐ पर नियमों के तहत अंकुश लग सकें और साथ ही इसे नियंत्रित भी किया जा सकें। बता दें कि राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तराखंड और दिल्ली के पेरेंट्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में निजी स्कूलों के खिलाफ याचिका दायर की है।

लॉकडाउन ने कमजोर किया अभिभावकों का आर्थिक और मानसिक पक्ष-

देश के अलग-अलग पेरेंट्स एसोसिएशन ने कहा कि वे बच्चों की जीवन और उनके शिक्षा के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट आए हैं। अभिभावकों का कहना है कि वे देश में कोरोना महामारी और लॉकडाउन से और अधिक आर्थिक रुप से अक्षम हो गए है, ऐसे में वे निजी स्कूलों में 12वीं कक्षा तक के बच्चों के लिए फीस देने में असहाय हैं। इस कारण निजी स्कूल बच्चों को निकालने की धमकी दे रहे हैं और कई अभिभावक खुद ही बच्चों को स्कूल से निकालने पर मजबूर हो रहे हैं। इसमें आर्थिक नुकसान के साथ सामाजिक स्थिति पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है, तो वहीं बच्चों के भविष्य की चिंता में मानसिक कष्ट भी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।

इसके अलावा अभिभावकों की तरफ से कहा गया कि अभी बोर्ड के नतीजे नहीं आए हैं, बच्चे ये नहीं जानते कि उन्हें किस स्ट्रीम में जाना है। बच्चों के पास किताबें और स्टेशनरी नहीं हैं इसलिए वे पढ़ाई के दौरान संदर्भ नहीं समझ पाते। बहुतों के पास लैपटाप, स्मार्टफोन नहीं है। जिन घरों में दो या ज्यादा बच्चे हैं उन्हें ऐसे में ज्यादा उपकरण चाहिए होते हैं। वहीं, सही से नेटवर्क भी नहीं आता है, और पूरे देश में पढ़ाई का कोई प्रभावी तंत्र भी नहीं है। इन सबसे बच्चों के ऊपर सामाजिक, बौद्धिक रुप से पिछड़ने का संकट उत्पन्न हो रहा है। लॉकडाउन के दौरान बच्चों की ऑनलाइन क्लासेज होने से उनके स्वास्थ्य पर भी खासा असर पड़ रहा है।

साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन क्लास के नाम पर निजी स्कूल पूरी फीस वसूल रहे हैं, जबकि कई राज्यों की सरकारों ने कहा है कि लॉकडाउन की अवधि में स्कूल केवल ट्यूशन फीस लें। तो कई निजी स्कूल तो ऑनलाइन क्लास के नाम पर अलग से फीस वसूल रहे हैं, जो सरासर नजायज और अन्याय है। अभिभावकों के संघ ने कोर्ट से अनुरोध करते हुए कहा कि आप केंद्र और सभी राज्य सरकारों को यह निर्देश दीजिए कि बच्चों की वास्तविक कक्षाएं शुरु होने से पहले छात्राओं से किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जाए। अब इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में इसी हफ्ते में सुनवाई होने के आसार है।

उधर, दूसरी तरफ भाजपा के सांसद और शिक्षक सेल की सदस्य लॉकेट चटर्जी की तरफ से भी मांग की गई है कि निजी स्कूलों को मार्च के मध्य में शुरू होने वाले संपूर्ण लॉकडाउन अवधि के लिए अभिभावकों से किसी तरह की फीस नहीं लेनी चाहिए। इससे इतर, दूसरी तरफ निजी स्कूलों ने भी राज्य सरकारों के साथ बातचीत में कहा है कि उनके भी कई ऐसे खर्च हैं, जो पूरी तरह बच्चों की फीस पर ही आधारित हैं। ऐसे में निजी स्कूलों का कहना है कि अगर बच्चों की फीस नहीं आएगी तो वे शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को वेतन कहां से देंगे? कई स्कूल इस बात पर राजी भी हुए थे कि वे केवल ट्यूशन फीस लेंगे और अन्य प्रकार के शुल्क में लॉकडाउन की अवधि में छूट दी जायेगी तथा कई स्कूलों ने री-एडमिशन चार्ज नहीं लेने की बात भी कही है।

वहीं, देश के विभिन्न राज्यों के हाईकोर्टों और सरकार ने निजी स्कूलों को अलग-अलग निर्देश दिए है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि निजी स्कूलों को  सिर्फ एडमिशन और ट्यूशन फीस लेने की इजाजत दी है और अन्य सभी प्रकार के शुल्कों इस सेशन में न बढ़ाने की सलाह दी है। इसके दूसरे तरफ बंबई हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को पलटते हुए कहा कि आप गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को फीस लेने से नहीं रोक सकते है।

वहीं, निजी स्कूल को भी कुछ राहत दी गई है बंबई हाईकोर्ट ने कहा कि निजी स्कूलों की आर्थिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए वे जिला के प्रमुख शिक्षा अधिकारी को इस संबंध में लिखित में सूचित करें और तीन हफ्तें के भीतर अधिकारी देखें कि अगर स्कूल के आर्थिक हालात बहुत ही दयनीय है तो उसे जरुरी सहायता उपलब्ध कराई जाए।

इन सबके बाद जो बात निकल कर सामने आई वो यह है कि जहां लॉकडाउन में एक तरफ अभिभावकों को स्कूल की फीस देने में परेशानी हो रही है, तो वहीं निजी स्कूलों को भी अपने शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को वेतन मुहैया कराने में दिक्कत आ रही है। इसके बाद अंत में कह सकते हैं कि विभिन्न निजी स्कूलों और अलग-अलग राज्यों के अभिभावकों के संघ को एक साथ बैठकर इस मुद्दों को जल्द से जल्द सुलझाना चाहिए, लेकिन फिलहाल इस मसले पर अब अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट ही करेगी, तो देखते है कि क्या सुप्रीम कोर्ट निजी स्कूलों और अभिभावकों के बीच गहराते फीस के संकट को सुलझा पाता है या नहीं?  या फिर कोई और विकल्प बताता है?

अमित कुमार, मीडिया दरबार

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