राजनीति

2022 चुनाव के लिए क्यों फेल हो गया BJP का जातीय समीकरण

2022 चुनाव से पहले BJP हुई फेल ?

आए दिन बंगाल और यूपी में चल रही राजनीतिक फेर बदल से तो हम आपको अवगत कराते रहते ही हैं, अब कल ही बात कर लीजिए कल ममता बनर्जी ने नंदीग्राम में चुनाव लड़ने की बड़ी घोषणा की तो वहीं दूसरी ओर यूपी 2022 चुनाव में कायस्थ समुदाय को साधने के लिए राजनीतिक दलों में सियासत तेज हो गई है|

2022 चुनाव
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लेकिन यूपी की राजनीति में अचानक कायस्थ समुदाय को लेकर सियासत क्यों तेज हैं ? कौन हैं कायस्थ? और यूपी की राजनीति में कायस्थ समुदाय 2022 चुनाव में होने वाले विधानसभा चुनाव पर कैसे प्रभाव डाल सकता है?

2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारिया शुरू

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव 2022 चुनाव में अभी वक्त हैं पर राजनीतिक दलों ने अभी से अपने राजनीतिक गठजोड़ और समीकरण साधने शुरु कर दिए हैं।

2022 चुनाव
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यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव 2022 चुनाव को लेकर भाजपा इस बार अपने जातीय समीकरण साधने में इस कदर खो गई कि अपने कोर वोट बैंक कायस्थ समुदाय को ही भूल गई हैं|

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लोकसभा चुनाव से लेकर, मेयर, और विधानपरिषद के चुनाव में बीजेपी ने किसी भी कायस्थ समुदाय के लोगों को टिकट नहीं दिया है, जबकि वहीं सपा द्वारा कायस्थ समुदाय को टिकट भी दिया गया और झांसी से मेयर पद के लिए प्रत्याशी भी दिया गया हैं।

2022 चुनाव
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भाजपा ने इस बार MLC चुनाव के लिए जातीय समीकरण साधते हुए ब्राह्मण , वैश्य, क्षत्रिय , भूमिहार और दलित समुदाय को टिकट देकर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की  गई हैं पर भाजपा इस कायस्थ समुदाय को इस बार प्रतिनिधत्व देने में चूक गई हैं|

दरअसल इस बार किसी भी कायस्थ समुदाय को 2022 चुनाव प्रत्याशी नहीं बनाया गया हैं और इसी कारण विपक्ष भाजपा पर एक बार फिर से सावल उठा रहा है।

कायस्थ समुदाय के इर्दगिर्द होगी यूपी 2022 चुनावी 

2022 उत्तर
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दरअसल कायस्थ समुदाय भारत में रहने वाले सवर्ण हिंदूओं की ही जाति है। माना जाता है कि गुप्तकाल के दौरान कायस्थ जाति का उद्भव हुआ था। हिंदुओं की मान्यता के अनुसार कायस्थ समुदाय में पैदा होने वाले को ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों धर्म को धारण करने का अधिकार हैं।

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वर्तमान समय में जिन्हें कायस्थ समुदाय के रुप में जाना जाता हैं वे मुख्य रूप से बिसारिया, श्रीवास्तव, सक्सेना, निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, दास, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं।

बीजेपी ने इस बार एमएलसी चुनाव में क्षत्रिय समुदाय से आने वाले झांसी के कुंवर मानवेंद्र सिंह को जगह दी है जबकि भूमिहार समुदाय से अरविंद कुमार शर्मा और अश्विन त्यागी को उम्मीदवार बनाया गया हैं।

OBC समुदाय से आने वाले स्वतंत्र देव सिंह और धर्मवीर भारती प्रजापति को भी इस बार प्रत्याशी बनाया गया हैं। भाजपा द्वारा जारी की लिस्ट में यह साफ दिखता भी है।

2022 चुनाव कायस्थ समुदाय को नहीं दिया मौका 

वाराणसी में सपा MLC आशुतोष सिंन्हा की जीत के बाद यह कयास लगाऐ जा रहें थे कि भाजपा इस बार कायस्थ समुदाय से अपना प्रत्याशी ज़रुर खड़ा करेंगी। लेकिन सबके अंदाज़े गलत साबित हुए और इस बार भाजपा की ओर से किसी भी कायस्थ को टिकट नहीं दिया गया।

भाजपा के परंपरागत वोटर माने जाने वाले कायस्थ को संगठन से लेकर MLC चुनाव में जगह ना देने के कारण विपक्ष उनपर सवाल तो खड़े कर ही रही हैं पर साथ ही वे अब भाजपा को कायस्थ विरोधी भी बता रही है।

सपा MLC आशुतोष सिन्हा ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक हुए सभी चुनाव में कायस्थ समुदाय ने बीजेपी को एक तरफा वोट देकर जीत दिलाई पर बीजेपी ने इसके बदले उन्हें केवल दरकिनार ही किया हैं।

वहीं समाज वादी पार्टी ने एक छोटे से कार्यकर्ता को भी MLC चुनाव में टिकट देकर यह साबित कर दिया हैं कि वह कायस्थ समुदाय के असली हितैषी है|

इन आरोपों के जवाब में भाजपा के मीडिया पैनलिस्ट नवीन श्रीवास्तव ने कहा कि यूपी में लगातार तीन चुनाव हारने के बाद विपक्ष अब घबरा गया हैं, इसलिए वो ऐसी राजनीति कर रहा है। कायस्थ समुदाय को बीजेपी ने हमेशा से ही सम्मान दिया है, और राष्ट्रवादी सोच के कारण कायस्थ बीजेपी की पहली पसंद भी रहा हैं।

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यूपी में कई मंत्री, विधायक औऱ प्रवक्ता कायस्थ समुदाय से ही हैं। इसके अलावा तीन जिला अध्यक्ष और कई प्रवक्ता भी कायस्थ समुदाय से हैं। नवीन श्रीवास्तव ने कहा कि केंद्रीय संगठन और सरकार में कायस्थ समुदाय की अच्छी खासी भागीदारी है।

बीजेपी नेतृत्व ने त्रिपुरा में कायस्थ विप्लब देव को मुख्यमंत्री,और झारखंड में दीपक प्रकाश को प्रदेश अध्यक्ष, रविशंकर प्रसाद को केंद्रीय मंत्री बनाया है। जो बीजेपी के कायस्थ के प्रति सम्मान को दिखाता है।

अब सावल यह उठता हैं कि क्या 2022 चुनाव के विधानसभा चुनाव में कायस्थ समुदाय भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता हैं?

दरअसल उत्तर प्रदेश में कुल वोट का करीब 3 प्रतिशत कायस्थ समुदाय से ही आता है। इसी कारण यह वर्तमान समय में भाजपा के परंपरागत वोटर कहें जाते हैं।

पूर्वी यूपी के गोरखपुर ,वाराणसी, बनारस,इलाहाबाद व बरेली सहित तमाम यूपी के कई बड़े शहरों में कायस्थ समुदाय का अच्छा खासा वोट प्रतिशत माना जाता हैं।

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जो केवल बीजेपी के 2022 चुनाव लिए ही क्यों किसी भी राजनीतिक दल के लिए शहरी सीट पर खेल बनाने औऱ बिगाड़ने की एहमियत रखता हैं। बतां दे की एक दौर था|

जब यह समुदाय कांग्रेस के साथ हुआ करता था पर राम मंदिर के मुद्दे से यह भाजपा के साथ हो गया और यूपी में भाजपा की जीत के पीछे इसका बड़ा हाथ माना जाता है|

अब अगर कायस्थ समुदाय भाजपा से रुठा तो 2022 चुनाव विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ जाऐंगी इस बात में कोई शक नहीं हैं।

रिपोर्ट- रुचि पाण्डें

मीडिया दरबार

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