विचार

RTI दायर करने से पहले जान ले अदालत का ये अहम फैसला

RTI Act में फिर हुआ बड़ा बदलाव

भारतीय संसद ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और सरकारी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए साल 2005 में सूचना का अधिकार आरटीआई कानून बनाया था|

इस कानून के तहत भारत का कोई भी नागरिक सरकार के किसी भी विभाग की जानकारी हासिल कर सकता है| लेकिन अब RTI को लेकर दिल्ली हाई कौर्ट का एक विवादित बयान आया है जिसके बाद देश भर के RTI एक्टिविस्ट्स आक्रोश में है |

RTI Act में 2019 का संसोधन

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2019 में RTI एक्ट में किये गए संसोधन से सुचना के अधिकार में कुछ बड़े बदलवा किये गए भारी विरोध के बीच ये संसोधन पारित हुए और RTI की धारा 13, 16 और 27 में संशोधन किया गया है इन धाराओं के तहत वो प्रावधान आते है जो आरटीआई आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल और उनका दर्ज़ा निर्धारित करते हैं|

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पहले सूचना आयुक्तों का दर्ज़ा चुनाव आयुक्तों और सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर था|  इसका मतलब ये था कि अगर इन्हें किसी भी सरकारी महकमे से सूचना निकालनी होती थी तो ये दर्जा उन्हें सक्षम बनाता था|

लेकिन 2019 संशोधन विधेयक में कहा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल और कार्यसीमा की परिभाषा केंद्र सरकार तय करेगी। साथ ही इसमें ये भी जोड़ा गया कि दोनों अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा से जुड़ी अन्य शर्तें भी केंद्र सरकार ही निर्धारित करेगी।

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अभी तक TRI में किये गए इन संसोधनो का विरोध जारी ही था की अब RTI को लेकर दिल्ली की हाई कोर्ट ने एक और विवादित बयान दे दिया है जिसके बाद एक बार फिर RTI एक्टिविस्टो का गुस्सा फुट पड़ा |

RTI Act को लेकर अब दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया ये फैसला

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दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करने वाले आवेदक को मांगी गई जानकारी हासिल करने का उद्देश्य बताना होगा। इससे साफ हो जाएगा कि आवेदक को जानकारी क्यों चाहिए और साथ ही उन लोगों से अन्याय होने से रोक लगेगी जिनके बारे में जानकारी मांगी जा रही है।

हालाँकि RTI की धरा 6(2) में ये साफ़ तौर से कहा गया है, ‘सूचना के लिए अनुरोध करने वाले आवेदक से सूचना का अनुरोध करने के लिए किसी कारण को या किसी अन्य कोई व्यक्तिगत ब्यौरा देने की जरूरत नहीं है यहाँ उसे केवल अपने संपर्क करने से जुडी जानकारी देनी होती है|

लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने अपने एक आदेश में कहा, ‘इस कोर्ट की राय है कि जब कभी आरटीआई एक्ट के तहत सूचना मांगी जाए, इसके पीछे के कारण का खुलासा करना जरूरी है ताकि आवेदक की प्रमाणिकता सिद्ध हो सके|’

इंडियन एक्सप्रेस में छपी  खबर के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रपति भवन में मल्टी-टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) की नियुक्ति को लेकर मांगी गई सूचना के संबंध में ये टिप्पणी की|

आवेदक हर किशन ने साल 2018 में संबंधित नियुक्ति को लेकर जानकारी मांगी थी| हालांकि विभाग ने उन्हें ज्यादातर जानकारी दे दी थी, लेकिन एक सवाल का जवाब नहीं दिया जिसमें चुने गए कैंडिडेट का आवासीय पता व उनके पिता के नाम की जानकारी मांगी गई थी|

जिसके विषय में राष्ट्रपति सचिवालय ने कहा कि इस जानकारी के खुलासे से व्यक्ति के निजता का उल्लंघन होगा क्योंकि यह निजी जानकारी है|

कोर्ट ने इस याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि कारण न बताने से उन लोगों के साथ अन्याय होगा, जिनके बारे में सूचना मांगी जा रही है|

इतना ही नहीं याचिकाकर्ता हरकिशन की याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने इस तथ्य को छिपाने के लिए याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया|

दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले की आरटीआई कार्यकर्ताओं ने आलोचना की है और इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे है |

 

रिपोर्ट-पूजा पाण्डेय

मीडिया दरबार

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