विचार

SSR Case में फंसे बुरे अर्नब गोस्वामी

SSR Case:रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ को कोर्ट की चेतावनी

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी आज कल हर तरफ से फसते हुए नज़र आरहे है एक तरफ TRP स्कैम मामले में उनकी whatsaap chat लीक होने से बवाल मचा हुआ है तो वही दूसरी ओर सुशांत सिंह हत्याकेस SSR Case के मामले में अब अर्नब की पत्रकारिता के तरीके की निंदा करते हुए को मुंबई हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में उन्हें चेतावनी दी है|

हालाँकि इसमें अर्नब अकेले नहीं है अर्नब के चैनल रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ जैसे दो बड़े चैनलों को ये चेतावनी मुंबई हाई कोर्ट की तरफ से दी गई है|

SSR Case में रिपोर्ट के लिए पड़ी फटकार

SSR Case
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दरसल सुशांत सिंह राजपूत डेथ केस में हुए “मीडिया ट्रायल” के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस अधिकारियों, साथ ही कार्यकर्ताओं, वकीलों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर फैसला देते हुए मुंबई हाई कोर्ट कई अहम बाते कही|

मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति गिरीश एस कुलकर्णी की पीठ ने टाइम्स नाउ और रिपब्लिक भारत के SSR Case मीडिया ट्रायल की सख्त निंदा करते हुए कहा की इन दोनों ही चैनलों ने अपने दायरे से बहार जाकर खुद ही मामले की जाँच करने लगे खुद की वकील बन गए और खुद ही जज बनकर मामले पर फैसल भी सुनाने लग गए|

SSR Case में चैनलों ने की मनमानी

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SSR Case 251 पेज के अपने फैसले में कोर्ट ने आगे कहा की एक दुसरे से ज्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश में इन दोनों चैनलों ने CRPC के आदेशो और कानून वयवस्था को हवा में उड़ाते हुए न्याय और सच्चाई की दिखावटी लड़ाई शुरू कर दी|

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महामारी के दौरान जैसे सब सो रहे थे और सिर्फ ये दो चैनल ही जग रहे थे कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा की इनके SSR Case न्यूज़ रिपोर्ट्स मे मुंबई पुलिस और रिया चक्रवर्ती को लेकर जो बाते कही गई उससे लोगो में कानून व्यवस्था के विश्वास को कम करता है|

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा की हमें उम्मीद है की आगे से चैनल अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे और कानूनी मामलो में इस तरह की रिपोर्टिंग नहीं करेंगे साथ ही अदालत ने याद दिलाया की इस पेंडिंग मामलो में इस तरह की रिपोर्टिंग केबल टीवी नेटवर्क रेगुलेशन एक्ट का उन्लंघन करती है|

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साथ ही कोर्ट ने चैनलों को चेतावनी भरे शब्दों में कहा की SSR Case जैसी रिपोर्टिंग डिबेट या इंटरव्यूज अपराधिक अवमानना का मामला है टीवी चैनलों को प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की गाइडलाइंस का पालन करना चाहिये|

इसी के साथ बोम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में समाज में मीडिया की अहमियत को उजागर करते हुए जसिका लाल, बिजल जोशी, नितीश कटारा जैसे कुछ केसों का उदाहरण देते हुए कहा की इन कैसो में मीडिया की वजह से ही न्याय हो पाया वरना इन मामलो में दोषी छूट जाते लेकिन अति उत्साहित पत्रकारिता से चैनलों को बचना चाहिये लोगो को आकर्षित करने के लिए इस तरह की रिपोर्टिंग उचित नहीं है ऐसा करने से न्याय वयवस्था में बाधा उत्पन होती है|

रिपोर्ट-पूजा पाण्डेय

मीडिया दरबार

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